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सिर पर रंग-बिंरंगे मुकुट पहनकर, हाथ में स्टीक लेकर सुंदर नृत्य प्रस्तुत किया
इंदौर. भईया मुझे ये मोरक्कनलेम्प दिखाईये ना, बहनजी ये मुगल लालटेन की क्या कीमत है। भाईसाहब ये चन्देरी का सूट दिखाईये। ये सब आवाजें शिल्प प्रेमियों के द्वारा लालबाग परिसर में मालवा उत्सव में शिल्पकारों के शिल्प देखते खरीदते समय सुनाई दे रही थी। पानीपत, हरियाणा से प्रजापतिजी मिट्टी शिल्प लेकर आये जिसमे ंमिट्टी के तवे, घोडे, क छुआ आदि है। वही कसरावद से आर्गेनिक कॉटन की सवीट्जरलैण्ड के डिजाईनरों की डिजाईन की हुई महेश्वरी साडियां, बायो रे संस्थान से अरूणजी आये है। वही शादाब अंसारी, मिर्जापुर, उत्तरप्रदेश से सुंदर कारीगरी किये गये गलीचे लेकर आये है। राजस्थान के जयपुर शहर से बारिक कारीगरी करे हुये मोरक्कनलेम्प, मुगल लालटे, क्रिस्टल झूमर लेकर फर्नाज आई है जो कि बहुत ही उम्दा किस्म की कारीगरी को दर्शाती है। आंध्रप्रदेश से वी चिन्नाकुलाई की यह लेदर से बने रंग-बिरंग्रे लेम्प, शेर के चित्र लेकर कई कलाकृतियां लेकर आई है। भारत सरकार नई दिल्ली व क्रिस्प भोपाल के सहयोग से आयोजित गांधी शिल्प बाजार में कच्छ गुजरात के सिकंदर भाई, चंदेरी, कॉटन, सिल्क के दुपट्टे लेकर आये है जो हाथों की उम्दाकारीगरी दर्शाते है। चंदेरी गांव से आये रामपाल कोहली, गांधी शिल्प बाजार में चंदेरी साडियां , सूट, ड्रेस मटेरियल का उम्दा नमूना लेकर मालवा उत्सव में आये है। लखनऊ से चिकल कारीगरी के कुर्ता व शटर््स भी यहां मिल रहा है। लोक संस्कृति मंच के संयोजक शंकर लालवानी ने बताया कि संस्कृति कार्यक्रम में मिले सुर ताल मेरा तुम्हारा से लगभग 200 कलाकरों ने एक सुर, एक ताल में अपने -अपने राज्यों के लोक नृत्यों की प्रस्तुतियां दी। जिसमें भारत की अनेकता में एकता के दर्शन हुये। उडीसा, बलांगीर से आये कलाकारों से आये बहन द्वारा अपने भाई की लंबी उम्र की कामना के लिए दशहरे के महीने के किया जाना नृत्य ढालखाई प्रस्तुत किया। मणीपुर के कलाकारों ने चैत्र के महीने में पूर्णिमा को होने वाला बसंतरास प्रस्तुत किया, जो राधा-कृष्ण की रासलीला को बताते हुए मन को शांति प्रदान कर गया जिसमें परमात्मा से आत्मा के मिलन को भक्ति के माध्यम से बताया गया। सात मटकिया सर पर लेकर, परात और गिलास पर बैलेन्स बनाकर होने वाला राजस्थानी भवई लोकनृत्य बहुत ही कमाल का रहा । बोल थे सागर पानी भरवा गई थी नगर लग जाये। साथ ही कालबेलियां नृत्य भी हुआ। कर्नाटक की गौडा जनजाति का नृत्य सुगी कुनिथा जो कि धान की फसल आने की खुशी में होली के समय किया जाता है। सिर पर रंग-बिंरंगे मुकुट पहनकर, हाथ में स्टीक लेकर सुंदर नृत्य प्रस्तुत किया गया। स्थानीय कलाकार मेघा शर्मा ने कृष्ण भजन तराना व शिव तांडव स्तुति कथक के माध्यम से प्रस्तुत किया। मालवा का कान ग्वालियर नृत्य बोल धीरे आन दे रे धीरे आन दे। पर ग्वालों द्वारा प्रस्तुत किया जिसमें नई फसल आने पर गाय चराने का मेहनताना मांगा जा रहा था। मंडलेश्वर से आये कलाकारों ने गुजराती डांगी नृत्य किया। जिसमें महापुरूषों के वेश, नर्मदा की झांकी आदि प्रस्तुत किये। भावनगर गुजरात से आये कलाकारों ने नवदुर्गा पर किया जाने वाला ताली गरबा खूबसूरती से पेश किया। पंजाब का भांगडा भी प्रस्तुत किया गया। तेलांगाना का गुस्साडी, गुजरात का राठवा भी किया गया। इस अवसर पर पवन शर्मा, कमल गोस्वामी, विशाल गिदवानी, महेश जोशी, सोना कस्तूरी, रितेश पिपलिया, निक्की शर्मा , साधना राठौर, दिलीप पांडे, नीरज कुसमाकर भी मौजूद थे। 6 मई के कार्यक्रम भील भागोरिया, बरेदी, ढालखाई, कोली सुगी-कुनिथा, उत्तराखंड, लाई हरोबा, भांगडा-गिद्धा, राठवा, ओडिसी नृत्य होंगे।


