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भक्त की प्रतिष्ठा के लिए खुद को दांव पर लगा देते हैं भगवान
धर्मराज कालोनी में शनि नवग्रह धाम पर हुई तांडव आरती
इंदौर. बेटियां भले ही समाज में पराया धन मानी जाती हो, उनका रिश्ता अपने पैतृक परिवार से कभी नहीं छूटता. बेटियां ही हैं जो दो परिवारों को जोड़ सकती हैं. नानीबाई का मायरा हमारी परंपराओं का उत्कृष्ट प्रमाण हैं जहां भगवान अपने भक्त की प्रतिष्ठा कायम रखने के लिए खुद को दांव पर लगा देते हैं. ससुराल की संकीर्ण मानसिकता में डूबी यह कथा उन लोगों के लिए बहुत बड़ा सबक है जो बहू को बेटी का दर्जा देने के लिए तैयार नहीं है. नानीबाई ऐसी बेटी है, जो अपने पिता का अपमान छुपाने के लिए स्वयं को हर हालात से मुकाबला करने के लिए तैयार रहती है.

ललितपुर-झांसी के भागवताचार्य पं. शुकदेव महाराज ने आज एरोड्रम रोड, कालानी नगर के पास स्थित धर्मराज कालोनी में चल रहे शनि जयंती महोत्सव में नानी बाई रो मायरो की कथा में दूसरे दिन उपस्थित भक्तों को संबोधित करते हुए उक्त प्रेरक विचार व्यक्त किए। आज शनि जयंती के मुख्य महोत्सव के उपलक्ष्य में शनि नवग्रह धाम की विशेष साज-सज्जा की गई थी। संध्या को रणजीत मौर्य एवं मनोज भार्गव ने शनि देव की तांडव आरती के दौरान तल्लीनता के साथ नवग्रह धाम में उपस्थित दो हजार से अधिक भक्तों को सम्मोहित बनाए रखा। लगभग आधे घंटे की इस आरती में मौर्य एवं भार्गव की भाव-भंगिमाएं एवं हावभाव इतने भक्तिपूर्ण थे कि अधिकांश नजरें उन पर ही जमी रही। आरती के लिए भगवान शनिदेव की प्रतिमा का विशेष मनोहारी श्रृंगार किया गया था। नवग्रह धाम के अन्य देवी-देवताओं को भी पुष्पों एवं पत्तियों से सजाया गया था. पार्षद दीपक जैन टीनू, गोपाल मालू, वीरेंद्र गुप्ता, शंकर ओझा, मनीष सोनी सहित अनेक गणमान्य अतिथि भी उपस्थित थे।
भगवान को भक्त का अपमान सहन नहीं
नानी बाई रो मायरो की कथा में आचार्य पं. शुकदेव महाराज ने कहा कि नानी बाई के ससुराल पक्ष में जब उन्हें मायरे के लिए लंबी चौड़ी सूची उपहार और अन्य सामग्री के लिए थमाई गई तो यह अपमान भगवान को सहन नहीं हुआ. भगवान भक्तों को प्रताडऩा से बचाने के लिए स्वयं पहुंच जाते हैं. भगवान के लिए भक्तों की प्रतिष्ठा सर्वोपरि होती है. भक्त का अपमान भगवान को किसी भी स्थिति में बर्दाश्त नहीं हो सकता. नरसी मेहता को भगवान शिव एवं कृष्ण, दोनों की कृपा प्राप्त हो गई थी। भक्ति के कारण वे अपना सब कुछ भूलने लगे थे. भगवान के सिवाय उन्हें कुछ याद नहीं रहता था। उनके पिता की बरसी भी स्वयं भगवान ने ही आकर की. इस कथा में नानी बाई के पिता की करूणा और स्नेह का अदभुत चित्रण है.


