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मध्यप्रदेश के डेंटल कॉलेजों में जल्द ही शुरू होगा एस्थेटिक्स एंड कॉस्मेटिक डेंटिस्ट्री फ़ेलोशिप प्रोग्राम
– इंडियन एकेडेमी ऑफ़ एस्थेटिक एंड कॉस्मेटिक डेन्टिस्ट्री द्वारा करवाई जा रही 28 वीं एनुअल कॉन्फ्रेंस 2019 में मेडिकल यूनिवर्सिटी जबलपुर के वाईस चांसलर डॉ आर एस शर्मा ने की घोषणा
इंदौर। अभी तक देश में कही पर भी एस्थेटिक्स एंड कॉस्मेटिक डेंटिस्ट्री के लिए कोई कोर्स नहीं है। सिर्फ इंडियन एकेडेमी ऑफ़ एस्थेटिक एंड कॉस्मेटिक डेन्टिस्ट्री द्वारा इसके लिए सर्टिफिकेट कोर्स करवाया जाता है, जिसके बाद डेंटिस्ट को एक्रेडिटेशन दिया जाता है। इस क्षेत्र में एक व्यवस्थित यूनिवर्सिटी स्तर के कोर्स की कमी को देखते हुए कॉन्फ्रेंस के दूसरे दिन मेडिकल यूनिवर्सिटी जबलपुर के वाईस चांसलर डॉ आर एस शर्मा ने मध्यप्रदेश के सभी डेंटल कॉलेजों में एस्थेटिक्स एंड कॉस्मेटिक डेंटिस्ट्री फ़ेलोशिप प्रोग्राम शुरू करने की महत्वपूर्ण घोषणा की।
कोर्स शुरू होने के बाद मध्यप्रदेश देश का ऐसा पहला राज्य बन जायेगा जहाँ कोस्मेटिक डेंटिस्ट्री को लेकर यूनिवर्सिटी लेवल पर कोर्स उपलब्ध होगा। इससे पहले इस क्षेत्र में विशेषज्ञता हासिल करने के लिए विदेश जाकर कोर्स करना पड़ता था। कॉन्फ्रेंस के ऑर्गेनाइजिंग सेक्रेटरी डॉ स्वर्णजीत एस गंभीर ने कहा हमें गर्व कि इस कॉन्फ्रेंस में इतना बड़ा निर्णय लिया गया। जो स्किल्स सीखने के लिए हमें विदेश या मेट्रो सिटीज में जाना पड़ा था, वो अब आने वाली पीढ़ी मध्यप्रदेश के डेंटल कॉलेजों में ही सीख पायेगी। इससे उनके समय और पैसो की बचत होगी। साथ ही लोगों को भी ज्यादा बेहतर सुविधाएं मिल पायेगी।
सिर्फ मध्यप्रदेश में ही हर साल लोग एस्थेटिक्स एंड कॉस्मेटिक डेंटिस्ट्री करीब-करीब 60 से 80 करोड़ रुपए तक सालाना खर्च करते हैं पर इस क्षेत्र में स्किलफुल डॉक्टर्स की काफी कमी है। यह कोर्स इस कमी को पूरा करने में मददगार साबित होगा। इस मौके पर डेंटल कॉउंसिल के प्रेसीडेंट,डीन फैकल्टी ऑफ डेंटिस्ट्री एमपी और गवर्मेंट कॉलेज ऑफ इंदौर के प्रिंसिपल डॉ देशराज जैन भी मौजूद थे, उन्होंने भी इस घोषणा की सराहना करते हुए तत्काल प्रभाव से इसे लागु करने में पूरी सहायता करने की बात कही।

अब पहले से तेज़ और आसान होगी डेंटल फीलिंग
टोक्यो मेडिकल एंड डेंटल यूनिवर्सिटी जापान से डॉ टोमोहीरो ताकागाकि ने यूनिवर्सल बॉन्डिंग सिस्टम विषय पर चर्चा के दौरान बताया कि पहले कॉस्मेटिक डेंटल फीलिंग के लिए जो मटेरियल आते थे, उनसे दांतों की फीलिंग करने के लिए चार स्टेप्स की प्रक्रिया पूरी करनी पड़ती थी। हर एक स्टेप 10 से 12 मिनिट का वक्त लेती थी और इस दौरान थोड़ा-सा भी मॉश्चर टच हो जाने पर पूरी प्रक्रिया ख़राब हो जाती थी।
इस समस्या को दूर करने के लिए अब यूनिवर्सल बॉन्डिंग सिस्टम के तहत नए तरह के फीलिंग मटेरियल आ चुके हैं, जिनकी मदद से सिर्फ 20 से 30 सेकंड में ही दांतो की फीलिंग की जा सकती है। यह मटेरियल पुराने मटेरियल की तरह बहुत मॉश्चर सेंसेटिव भी नहीं है। इसी बारे में अधिक जानकारी देते हुए मंगलोर से आये अरविन्द शिनॉय ने कहा कि इससे ना सिर्फ डॉक्टर और मरीज का समय बचेगा बल्कि यह मटेरियल ज्यादा लम्बे समय तक दांतों पर टिका भी रहेगा, जिससे हमें बेहतर पर्फोमन्स मिल पायेगी और मरीज को भी बार-बार परेशान नहीं होना पड़ेगा।
साइन्टिफिक सेशन के दूसरे दौर में फेलियर्स इन एस्थेटिक्स विषय पर मुंबई से आए डॉ अजीत शेट्टी और पुणे से आए डॉ शैल जग्गी ने एस्थेटिक्स एंड कॉस्मेटिक डेंटिस्ट्री प्रोसिजर्स में असफ़लता के प्रतिशत को कम करने के लिए नई तकनीकों, मटेरियल और इंस्ट्रूमेंट्स आदि की जानकारी दी। शाम को ब्रिलिएंट कवेंशन सेंटर में रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम भी हुए।
देश में 50 प्रतिशत लोग आज भी आर्थिक कारणों से दांतों के इलाज से महरूम

मुंबई से आए एकेडमी के प्रेसीडेंट डॉ वीएस मोहन कहते हैं कि 1992 में इस एकेडेमी के शुरुआत के वक्त सिर्फ हम सात लोग थे। हमने महसूस किया कि दांतों की आम बीमारियों के अलावा भी लोगों को अपने दांतों के आकर-प्रकार को लेकर कई तरह की समस्याएं होती है। इनसे न सिर्फ उनका कॉन्फिडेंस कम होता है बल्कि कई बार शादी होने में भी तकलीफ आती है।
आज तो सोशल मीडिया ने मेडिकल की परिभाषा ही बदल दी है। रंग-रूप का महत्त्व समय के साथ बढ़ गया पर पर हमारी सरकार आज भी यह नहीं समझ पाई है कि खूबसूरत दिखना एक इंसान का मूल अधिकार होता है। यही कारण है कि दांतों के इलाज को मेडिकल इंशोरेंस में शामिल करने के लिए किसी तरह का प्रावधान नहीं किया गया है।
आज भी 50 प्रतिशत लोग आर्थिक अभावों के चलते अपने दांतों का सही इलाज नहीं करा पा रहे है। जबकि पहली बार दांतों में लगे छोटे से कीड़े को यदि नजरअंदाज कर दिया जाए तो आगे चलकर समस्या गंभीर रूप भी ले सकती है।


