वर्ल्ड स्ट्रोक डे: स्ट्रोक के लक्षण दिखते ही लें चिकित्सा सहायता, हर मिनट है कीमती

· लक्षणों को पहचानने और समय पर इलाज शुरू करने से बच सकती है जान, स्थायी दिव्यांगता का खतरा भी हो सकता है कम

इंदौर, 28 अक्टूबर 2026। स्ट्रोक एक ऐसी गंभीर मेडिकल इमरजेंसी है, जिसमें मस्तिष्क के किसी हिस्से में रक्त की आपूर्ति बाधित होने या रक्तस्राव होने से ब्रेन सेल्स को नुकसान पहुंच सकता है। ऐसे मामलों में इलाज मिलने में होने वाली देरी मरीज की स्थिति को गंभीर बना सकती है। इसी संदेश के साथ 29 अक्टूबर को वर्ल्ड स्ट्रोक डे मनाया जाएगा। वर्ष 2026 में वर्ल्ड स्ट्रोक ऑर्गनाइजेशन की कैंपेन का संदेश ‘एवरी मिनट काउंट्स’ यानी हर मिनट कीमती है। इसका उद्देश्य लोगों को स्ट्रोक के शुरुआती लक्षणों के प्रति जागरूक करना और लक्षण दिखाई देने पर तत्काल चिकित्सा सहायता लेने के लिए प्रेरित करना है।

केयर सीएचएल हॉस्पिटल इंदौर के न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. आशीष बागड़ी, कंसल्टेंट-न्यूरोलॉजिस्ट ने बताया कि स्ट्रोक के लक्षण अक्सर अचानक दिखाई देते हैं। चेहरे का एक तरफ झुक जाना, एक हाथ या पैर में अचानक कमजोरी अथवा सुन्नपन आना, बोलने में परेशानी होना, बात समझने में कठिनाई, अचानक नजर कमजोर होना या संतुलन बिगड़ना इसके प्रमुख संकेत हो सकते हैं। कई बार लोग इन लक्षणों को थकान, कमजोरी या उम्र का असर मानकर नजरअंदाज कर देते हैं, जबकि ऐसा करना खतरनाक हो सकता है। यदि किसी व्यक्ति में ऐसे लक्षण दिखाई दें, तो तुरंत इमरजेंसी मेडिकल सहायता लेनी चाहिए। लक्षण कुछ समय बाद अपने आप ठीक हो जाएं, तब भी चिकित्सकीय जांच जरूरी है।

डॉ. बागड़ी ने कहा, “स्ट्रोक के मामले में समय पर पहचान और इलाज बेहद महत्वपूर्ण है। मरीज को अस्पताल पहुंचाने में होने वाली देरी उसके मस्तिष्क को होने वाले नुकसान को बढ़ा सकती है। इसलिए लोगों को स्ट्रोक के शुरुआती संकेतों की जानकारी होनी चाहिए। चेहरे में अचानक बदलाव, हाथ में कमजोरी या बोलने में परेशानी दिखाई देने पर घरेलू उपचार या लक्षण ठीक होने का इंतजार करने के बजाय तुरंत इमरजेंसी सहायता लें। स्ट्रोक के मरीज को जितनी जल्दी उचित इलाज मिलता है, उसके बेहतर रिकवरी की संभावना उतनी ही बढ़ सकती है।”

मेदांता हॉस्पिटल, इंदौर के डायरेक्टर, न्यूरोसाइंसेज, डॉ. रजनीश कछारा, ने कहा, “स्ट्रोक के बाद मरीज की रिकवरी में समय पर इलाज के साथ-साथ सही रिहैबिलिटेशन और नियमित मेडिकल फॉलोअप की भी अहम भूमिका होती है। कई मरीजों को स्ट्रोक के बाद चलने-फिरने, बोलने और रोजमर्रा के काम करने में कठिनाई हो सकती है। ऐसे में मरीज की स्थिति के अनुसार फिजियोथेरेपी, स्पीच थेरेपी और अन्य रिहैबिलिटेशन सेवाएं उसकी कार्यक्षमता सुधारने में मदद कर सकती हैं। मरीज और परिवार को यह समझना जरूरी है कि रिकवरी की प्रक्रिया हर व्यक्ति में अलग हो सकती है। सही देखभाल, नियमित अभ्यास और डॉक्टर की सलाह का पालन मरीज को अधिक आत्मनिर्भर बनाने में मदद कर सकता है।”

केयर सीएचएल हॉस्पिटल इंदौर के सीनियर कंसल्टेंट-न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. मनोरंजन बरनवाल ने बताया कि स्ट्रोक के जोखिम को कम करने के लिए ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखना जरूरी है। इसके अलावा धूम्रपान से दूरी, नियमित शारीरिक गतिविधि, संतुलित खानपान, पर्याप्त नींद और समय-समय पर स्वास्थ्य जांच भी महत्वपूर्ण हैं। जिन लोगों को पहले स्ट्रोक या हृदय संबंधी समस्याएं हो चुकी हैं, उन्हें डॉक्टर की सलाह के अनुसार नियमित फॉलोअप और दवाओं का सेवन करना चाहिए। अनियंत्रित हाई ब्लड प्रेशर स्ट्रोक के प्रमुख जोखिम कारकों में शामिल है, इसलिए इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

डॉ. बरनवाल ने कहा, “स्ट्रोक को लेकर सबसे जरूरी बात यह है कि इसके लक्षणों को पहचानने में समय बर्बाद न किया जाए। कई मरीज शुरुआती संकेतों को हल्के में लेते हैं या अस्पताल जाने में देर कर देते हैं। स्ट्रोक के संदेह में तुरंत इमरजेंसी सहायता लेना जरूरी है, क्योंकि कुछ उपचार सीमित समय के भीतर ही दिए जा सकते हैं। साथ ही, नियमित स्वास्थ्य जांच और जोखिम कारकों पर नियंत्रण रखकर स्ट्रोक की आशंका को कम किया जा सकता है। लोगों को यह समझना होगा कि जागरूकता, समय पर निर्णय और सही चिकित्सा सहायता मरीज की जान बचाने तथा लंबे समय तक रहने वाली दिव्यांगता का खतरा कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। स्ट्रोक के लक्षण पहचानने के लिए ‘फास्ट’ (FAST) नियम याद रखा जा सकता है। इसमें एफ यानी फेस-चेहरे का एक तरफ झुकना, ए यानी आर्म-एक हाथ में कमजोरी, एस यानी स्पीच-बोलने में परेशानी और टी यानी टाइम-तुरंत इमरजेंसी सहायता लेना शामिल है। इनमें से कोई भी संकेत दिखाई देने पर तुरंत चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए। स्ट्रोक के मरीज को खुद गाड़ी चलाकर अस्पताल जाने के लिए नहीं कहना चाहिए और न ही बिना चिकित्सकीय सलाह के कोई दवा देनी चाहिए। वर्ल्ड स्ट्रोक डे का संदेश यही है कि लक्षणों को पहचानें, देरी न करें और समय पर इलाज लेकर जीवन और मस्तिष्क को होने वाले नुकसान से बचाने की दिशा में कदम उठाएं।”

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