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बच्चों के लिए जानलेवा हो सकती है कावासाकी
इंदौर। 5 साल से कम उम्र के बच्चो में बुखार के साथ चहरे, आँखों, जुबान और होंठों के लाल होने पर अक्सर पहली शंका किसी प्रकार की एलर्जी की होती है। इलाज भी सामान्य बीमारी की तरह होता है और उसमे कीमती वक्त गुजर जाता है जबकि यह लक्षण कावासाकी नामक गंभीर बीमारी के होते हैं। इस बीमारी में यही शुरुआती 10 दिनों में इलाज ना मिले तो इसका असर ह्रदय की कोरोनरी आटरी पर हो सकता है, जिसके गंभीर परिणाम सामने आते हैं।
कनेक्टिव टिश्यू डिसीज पर नेशनल कॉन्फ्रेंस के दौरान ब्रिलिएंट कन्वेंशन सेंटर में यह बात चंडीगढ़ पीजीआई हॉस्पिटल से आए डॉ सुरजीत सिंह ने कही। उन्होने बताया की यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस बीमारी के बारे में ज्यादा लोगों को जानकारी नहीं है। चंडीगढ़ के आंकड़ों के मुताबिक हर एक लाख में से 5 बच्चों को यह बीमारी होती है। खास बात यह है कि इसके ज्यादातर केसेस अपर सोशल इकोनोमिकल सेगमेंट में देखे जा रहे हैं। यानि जीवनशैली में सुधार के साथ इस बीमारी की आशंका बढ़ती जाती है। इस बीमारी को 1961 में जापान के डॉ कावासाकी ने डाइग्नोस किया था परन्तु तब से अब तक कोई भी इसके कारण की खोज नहीं कर पाया है।
कनेक्टिव टिश्यू डिसऑर्डर में होती है कई बीमारियां
कॉन्फ्रेंस के सेक्रेटरी रिह्यूमेटोलॉजिस्ट डॉ आशीष बाड़ीका बताते हैं कि कनेक्टिव टिश्यू डिसऑर्डर के अंतर्गत कई तरह की बीमारियां होती है । इनमे लुपस,सेलेरोडेर्मा, रहूमटॉइड आर्थराइटिस, म्योसिटिस, वगैरह आम है। खास बात यह है कि इन सभी बीमारियों में जोड़ों में दर्द या त्वचा में विभिन्न प्रकार के चकत्ते जैसे बाहरी लक्षण दिखाई देते हैं, जिसे आमतौर पर डॉक्टर और मरीज दोनों ही गम्भीरतापूर्वक नहीं लेते जबकि ये सभी बीमारियां बेहद गंभीर है और शरीर के जरुरी अंदरूनी अंगों को धीरे-धीरे क्षतिग्रस्त करती जाती है। सही समय पर इनकी पहचान होने पर ही सही इलाज मिलना संभव होता है। इस कॉन्फ्रेंस का मुख्य उद्देश्य इन्ही बीमारियों के प्रति जागरूकता लाना और इनकी नवीन चिकित्सा विधियों के बारे में डॉक्टर्स को जानकारी देना है।
विकसित हो रही है बायोलॉजिकल दवाइयां
प्रो. डॉ देवाशीष दाण्डा ने बताया कि समय के साथ अब बायोलॉजिकल दवाएं काफी विकसित हो रही है। पहले ये दवाइयां सिर्फ रहूमटॉइड आर्थराइटिस के लिए कारगर थी जबकि अब लुपस, सेलेरोडेर्मा और म्योसिटिस जैसी कई बीमारियों में इनका उपयोग होने लगा है। इन दवाइयों को एनिमल और ह्यूमन टिश्यू मिलकर तैयार किया जाता है। बायोलॉजिकल मेडिसिन्स के क्षेत्र में हुई नई खोजों से इस क्षेत्र में क्रन्तिकारी परिवर्तन आए है।
डॉ (लेफ्टिनेंट जनरल) वेद चतुर्वेदी ने कॉन्फ्रेंस में बताया कि अब ऑर्थराइटिस बुजुर्गों की नहीं बल्कि युवाओं की बीमारी बन चुकी है। इस बीमारी के90 प्रतिशत मरीज युवा है, जिसमें महिलाओं का आकड़ा तीन गुना ज्यादा है। डॉ चतुर्वेदी कहते हैं कि महिलाओं में अमूमन यह बीमारी बच्चे होने के बाद होती है। एक ओर उन पर जिम्मेदारियों का बोझ बढ़ता चला जाता है और दूसरी ओर बीमारी के कारण उनका शरीर कमजोर होता जाता है, जिस कारण वे अपनी जिम्मेदारियां ठीक प्रकार से नहीं निभा पाती है। डॉक्टर को दिखाने के बढ़ जब पता लगता है कि इस बीमारी का इलाज आजीवन चलेगा तो ऐसे दम्पत्तियों के बीच तलाक तक की नौबत आ जाती है। आज ऑर्थराइटिस भी तलाक का एक बड़ा कारण बनता जा रहा है। ऐसी बीमारियों में एंटी रिमोटाइड ड्रग्स और बायोलॉजिकल दवाइयां काफी अच्छे परिणाम दे रही है।


