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बच्चों के संपूर्ण स्वास्थ्य देखभाल के लिए एक होकर काम करें सरकारी और निजी अस्पताल
चिकित्सा जगत का महाकुंभ ‘पेडिकॉन – 2020’
इंदौर। गुरुवार को ब्रिलिएंट कन्वेंशन सेंटर में चिकित्सा जगत के महाकुंभ का आगाज भी भव्य तरीके से किया गया। इंडियन एकेडमी ऑफ़ पेडियाट्रिशियन्स द्वारा आयोजित इस चार दिनी कॉन्फ्रेंस की थीम ‘क्वालिटी चाइल्ड केयर’ है। कॉन्फ्रेंस के पहले दिन 120 रजिस्ट्रेशन डेस्क पर 7000 से ज्यादा रजिस्ट्रेशन हुए।
कॉन्फ्रेंस के चीफ ऑर्गेनाइजिंग सेक्रेटरी डॉ वीपी गोस्वामी ने बताया कि कॉन्फ्रेंस के पहले दिन ब्रिलिएंट कन्वेंशन सेंटर के 12 हॉल्स में बच्चों के सर से पैर तक हर अंग के स्वास्थ्य संबंधित विषयों पर बहुत ही ज्ञानवर्धक सत्र हुए। इस कॉन्फ्रेंस में छोटे से छोटे गांव और कस्बों के डॉक्टर्स शामिल हुए है, जन्हें बच्चों के स्वास्थ्य से जुडी विश्व स्तरीय जानकारियां सहज रूप से मिल रही है। उन्होंने बताया कि पहले हॉल में बच्चों के टीकाकरण से संबंधित लेक्चर में रोटावायरस, माता का टिका और पेंटावेलेंट में पोलियो का टिका मिलकर बनाए गए नए हेक्सावेलेंट टिके के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई।
कॉन्फ्रेंस के औपचारिक शुभारंभ शाम 07:30 बजे हुआ, जिसमें मुख्य अतिथि स्वास्थ्य मंत्री श्री तुलसी सिलावट, उच्च शिक्षा, खेल और युवा मामलों के मंत्री श्री जीतू पटवारी थे। उनके साथ ही विशेष अतिथि के रूप में महापौर मालिनी सिंह गौड़ भी उपस्थित थी। कमिश्नर आकाश त्रिपाठी और गायक चिंतन बाकलीवाल भी कॉन्फ्रेंस के उद्घाटन समारोह में शामिल थे। इस समारोह में इन सभी के साथ प्राडर विले नामक बीमारी से पीड़ित 2 बच्चे भी मंच पर मौजूद रहते हुए उद्घाटन का हिस्सा बने।
डेटा एक सेंट्रल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध हो
सोसायटी के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ बकुल पारीख ने कहा कि शिशु मृत्युदर को कम करने के लिए अब जमीनी स्तर पर तेज़ी से काम करने की जरूरत है। इसके लिए अब सरकारी और निजी अस्पतालों को एक होकर काम करना होगा। शिशुओं के स्वास्थ्य को लेकर चल रही सरकारी योजनाओं का लाभ सिर्फ सरकारी अस्पतालों में जाने वाली मरीजों तक सिमित ना रखते हुए इसे सामान रूप से निजी अस्पतालों के मरीजों तक भी पहुंचने की जरूरत है ताकि अस्पतालों में जगह और सुविधाओं की कमी के साथ ही अभिभावकों के आर्थिक रूप से सक्षम ना होने के कारण किसी भी बच्चे को अपनी जान ना गवानी पड़ें। इसके साथ ही इन सभी अस्पतालों का डेटा एक सेंट्रल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध करवाया जाना चाहिए, ताकि इसके अनुसार बच्चों के स्वास्थ्य के लिए उचित योजनाएं बनाई जा सकें।
चैरिटी क्लिनिक और एंटरटेनमेंट जोन है खास
डॉ राजीव संघवी ने बताया कॉन्फ्रेंस के साथ ही एक चैरिटी क्लिनिक का संचालन भी किया जा रहा है, जहाँ लंबे समय से गंभीर रोगों से पीड़ित बच्चों को अंतराष्ट्रीय स्तर के डॉक्टर्स के द्वारा मुफ्त में इलाज दिया जा रहा है। कोर्डिनेटर डॉ प्रमोद जैन ने बताया कि कॉन्फ्रेंस में आने वाले डॉक्टर्स के लिए विशेष क्लॉक रूम बनाया गया है, जहाँ वे अपना सामान रख सकते हैं। उनके साथ आने वाली परिजनों के लिए एंटरटेनमेंट जोन भी बनाया गया है, जहाँ स्टेज शो, मैजिक शो और बच्चों के लिए डांस पर्फोमन्स हो रही है।
बच्चों में 25 प्रतिशत तक कम हो रही है रोगप्रतिरोधक क्षमता
कॉन्फ्रेंस में दिल्ली से आए आईसीयू इंचार्ज डॉ नमित जैरथ ने कहा कि आईसीयू में हमें बच्चों में फंगल इंफेक्शन के खतरे को सबसे ज्यादा फेस करना पड़ता है। सभी तरह के इंफेक्शन कंट्रोल करने का पहला और आसन तरीका है हाथ धोना। सही तरीके से समय -समय पर हाथ धोकर ज्यादातर इन्फेक्शंस से बचा जा सकता है।

डॉ जैरथ ने बताया कि अब इंफेक्शन का इलाज करने का तरीका पूरी तरह बदल गया है। पहले जहाँ इंफेक्शन के कारणों का पता लगाने के लिए की जाने वाली जाँच की रिपोर्ट ही हमें दो-तीन दिन में मिलती थी और तब तक हमें सिर्फ अंदाजे से ही दवाई देनी पड़ती थी। वही अब पीसीआर आधारित टेस्ट के जरिए यह रिपोर्ट सिर्फ 2 से 6 घंटों में ही मिल जाती है, जिससे हम सही समय पर सटीक इलाज कर पाते हैं। एक ओर इलाज पहले से बेहतर हो गया है पर दूसरी ओर हम देख रहे हैं कि इन्फेक्शंस के प्रति बच्चों की प्रतिरोधक क्षमता में 20 से 25 प्रतिशत तक कमी आ गई है। इसका मुख्य कारण दवाई की दुकान से कोई भी एंटीबायोटिक लेकर बच्चों को खिला देने की प्रवत्ति है, जिससे बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता पर बुरा प्रभाव पड़ने लगा है। बच्चों को डॉक्टर्स से परामर्श करने के बाद ही कोई दवाई दी जानी चाहिए।
बच्चों में लिवर से संबंधित रोगों पर हुई विस्तृत चर्चा
चीफ ऑर्गेनाइजिंग चेयरपर्सन प्रो डॉ शरद थोरा ने बताया कि कॉन्फ्रेंस में बच्चों में लिवर फेलियर ओर लिवर से संबंधित अन्य रोगों के कारण और निदान पर विस्तृत चर्चा हुई। इसमें विशेष रूप से गांवों में काम करने वाली डॉक्टर्स को बच्चों में लिवर से जुड़े गंभीर रोगों के इलाज के बारे में महत्वपूर्ण जानकारियां दी गई।
बच्चों में लिवर से जुडी बीमारियों का प्रमुख कारण हेपेटाइटिस, वायरस, मैटाबॉलिक डिसऑर्डर, जेनेटिक डिसऑर्डर आदि होते हैं। यदि जन्म के 6 माह के अंदर यदि बच्चे को लिवर रोग होते हैं तो गर्भ में माँ से मिले संक्रमण के कारण ऐसा होता है। गंभीर लिवर रोग की स्थिति में डॉक्टर्स को सामान्य डाइग्नोसिस करके बच्चों को प्राथमिक उपचार देने के बाद चिकित्सकीय सुविधायुक्त वाहन से तुरंत किसी बड़े अस्पताल पहुँचाना चाहिए। कॉन्फ्रेंस के पहले दिन बच्चों में लिवर ट्रांसप्लांट के बारे में भी गहन चर्चा हुई, जिसमें बताया गया कि सही समय पर लिवर की खराबी का पता लेकर यदि ट्रांसप्लांट कर दिया जाए तो बच्चे को एक बेहतर गुणवत्तापूर्ण लंबा जीवन मिल सकता है।
जल्दी बड़े हो रहे हैं बच्चे
बच्चों की ग्रोथ और सेक्सुअल मेच्योरिटी पर हुए सेशन में डॉ वामन खांडीलकर ने बताया कि आईएपी सॉफ्टवेयर की मदद से बच्चों की ग्रोथ और सेक्सुअल मेच्योरिटी से जुडी सटीक जानकारियां प्राप्त की जा सकती है, जिनकी मदद से कई रोगों के निदान में सहायता मिलती है। अपने सेशन में उन्होंने बॉन एज असेसमेंट की विभिन्न विधियां भी बताई।
डॉ खांडीलकर ने कहा कि लड़कों और लड़कियों दोनों में मेच्योरिटी की उम्र कम हो गई है। पहले जहाँ लड़कों को 18 साल के बाद दाढ़ी-मूंछे आना शुरू होती थी वही अब 15 -16 साल की उम्र से ही यह प्रक्रिया शुरू हो गई है। इसी तरह लड़कियों में अब 8 साल के बाद से ही मेच्योरिटी प्रोसेस शुरू होने लगा है और 11 साल की उम्र से पीरियड्स शुरू होने लगते हैं। इस सेशन के दौरान रियल लाइफ केसेस के जरिए विभिन्न बीमारियों के लक्षण और निदान बताए गए।
नवजात शिशु से लेकर 16 साल के किशोर को भी हो सकता है गठिया

आमतौर पर गठिया को वृद्धों की बीमारी माना जाता है पर कॉन्फ्रेंस में आई बच्चों की गठिया रोग विशेषज्ञ डॉ ज्योति संघवी ने बताया कि नवजात शिशु से लेकर 16 साल के किशोर को भी गठिया रोग हो सकता है। बच्चों में यदि लंबे समय तक बुखार, जोड़ों में दर्द, धुप में जाने पर त्वचा में रेशेस और आँखों में लालपन जैसे लक्षण दिखाई देते ही गठिया रोग विशेषज्ञ से परामर्श करना चाहिए।
ऑर्गनाइजिंग कमिटी के मेंबर डॉ अशोक शर्मा ने बताया कि कॉन्फ्रेंस में प्लास्टिक और कागज का उपयोग कम से कम करके इसे इकोफ्रेंडली इवेंट बनाने का प्रयास किया गया है।


