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दिया मिर्ज़ा ने कहा– “प्रकृति हमें जीवन देती है, उससे अलग होने का सवाल ही नहीं”
दिया मिर्ज़ा के सहयोग से बनी लघु फिल्म पन्हा फिल्म समारोहों में लगातार सराहना बटोर रही है। इस फिल्म ने ऑल लिविंग थिंग्स एनवायरमेंटल फिल्म फेस्टिवल (ALT EFF) में बेस्ट इंडियन शॉर्ट फिल्म, 9वें वर्ल्ड इंडियन फिल्म फेस्टिवल (हैदराबाद) में बेस्ट फिल्म, ध्रुमा फिल्म फेस्टिवल में बेस्ट फिल्म का सम्मान हासिल किया है। वहीं 13वें मुंबई शॉर्ट्स इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में इसे ऑनरेबल ज्यूरी मेंशन भी मिला।
सात वर्षीय विठू की नज़र से दिखाई गई पन्हा की कहानी महाराष्ट्र के एक शांत गांव में घटित होती है, जहां उसका परिवार एक इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना के कारण अपनी पुश्तैनी आम की बाग़ खोने की कगार पर है। जहां बाबा शहर जाकर नई ज़िंदगी शुरू करने का सपना देखते हैं, वहीं काका उस ज़मीन को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं, जिसने पीढ़ियों से उनके परिवार को संजोकर रखा है। जैसे-जैसे बेदखली का समय नज़दीक आता है और परिवार के भीतर तनाव बढ़ता है, विठू खुद एक बड़ा कदम उठाता है और गांव छोड़ने से कुछ दिन पहले ही अचानक लापता हो जाता है। उसे ढूंढ़ने की परिवार की कोशिश एक भावनात्मक सफर में बदल जाती है, जो उनके प्रेम, धैर्य और “घर” के असली मायने की परीक्षा लेती है।
फिल्म का समर्थन करने के अपने फैसले के बारे में बात करते हुए दिया मिर्ज़ा ने बताया कि उनका प्रकृति से जुड़ाव हमेशा से बेहद व्यक्तिगत और गहरा रहा है।
दिया ने कहा, “शायद इसकी शुरुआत मेरे घर के पीछे लगे एक आम के पेड़ से हुई, जिसकी घनी शाखाओं पर बैठकर मैं गर्मियों की छुट्टियों में किताबें पढ़ा करती थी। उसकी शाखाएं इतनी चौड़ी थीं कि मैं आराम से उन पर लेट जाती थी, पेड़ के तने का सहारा लेकर किताब पढ़ती थी। जब भी मुझे डांट पड़ती या मैं किसी बात से परेशान होती, तो वही मेरी पनाह बन जाता था। वह पेड़ इतना विशाल था कि कई-कई घंटे उसकी गोद में बीत जाते और मुझे नीचे उतरने की ज़रूरत ही महसूस नहीं होती थी। बचपन से प्रकृति के साथ इस रिश्ते ने मेरे भीतर दुनिया को देखने का एक गहरा नज़रिया पैदा किया। तभी यह एहसास मन में बस गया कि हम प्रकृति का ही हिस्सा हैं। और यही समझ आगे चलकर हमारे जीवन के उद्देश्य को भी आकार देती है।”
उन्होंने आगे बताया कि मिस इंडिया बनने के बाद उनकी ज़िंदगी पूरी तरह बदल गई थी और वह एक भौतिकवादी दुनिया का हिस्सा बन गई थीं।
दिया ने कहा, “लेकिन फिर एक दिन मैं मध्य प्रदेश के पेंच के जंगल गई। जंगल की उस यात्रा ने मेरे भीतर कुछ बदल दिया। उसने मुझे वह सब फिर से याद दिलाया, जिसे मैं बचपन में सहज रूप से जानती थी। उस ठहराव ने मुझे मेरे जीवन का उद्देश्य समझाया। वहां स्थानीय समुदायों और वन रक्षकों के साथ समय बिताना, जंगल में पैदल चलना, तस्वीरें लेना और उनसे बातचीत करना… इन सबने मुझे यह महसूस कराया कि अगर मैं एक सार्वजनिक हस्ती होकर भी अपनी आवाज़ का इस्तेमाल लोगों को यह याद दिलाने के लिए नहीं कर सकूं कि हम सब एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं, तो फिर मेरी पहचान का कोई अर्थ नहीं है। तभी से मेरा प्रयास यही रहा है कि लोगों को यह एहसास दिलाऊं कि हम सब एक-दूसरे से जुड़े हैं।”
इसके बाद उन्होंने एक ऐसी बात कही, जिसमें प्रकृति के साथ हमारे रिश्ते का सार समाया हुआ है।
“हम इस धरती से जुड़े हैं। हम प्रकृति का हिस्सा हैं, उससे अलग नहीं हैं। हमारी ज़िंदगी की हर ज़रूरत हमें इसी धरती से मिलती है और यही धरती हमें अपनी गोद में संभालकर रखती है।”
निर्देशक साक्षी मिश्रा द्वारा निर्देशित पन्हा, वन इंडिया स्टोरीज़ के बैनर तले बनी एक लघु फिल्म है। यह बचपन की दोस्त दिया मिर्ज़ा और अनन्या राणे के बीच पहली रचनात्मक साझेदारी है। महाराष्ट्र के आम के बागानों से शुरू हुआ यह सफर आज देश-विदेश के दर्शकों के दिलों को छू रहा है।


