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अंतरराष्ट्रीय सीए दिवस: चिन्मय मांडलेकर की ‘गवर्नर: द साइलेंट सेवियर’ में अर्थव्यवस्था बनी कहानी की असली नायक
अंतरराष्ट्रीय चार्टर्ड अकाउंटेंट्स दिवस के अवसर पर देशभर में वित्त, आर्थिक निर्णयों और राष्ट्र के भविष्य को दिशा देने वाले लोगों की चर्चा होती है। ऐसे समय में निर्देशक चिन्मय मांडलेकर की हाल ही में प्रदर्शित फिल्म ‘गवर्नर: द साइलेंट सेवियर’ इस चर्चा को एक अलग सिनेमाई दृष्टिकोण देती है। यह फिल्म 1990 के दशक की शुरुआत में भारत के आर्थिक संकट और उस कठिन दौर में देश को संभालने वाले नेतृत्व से प्रेरित है।
जहां मुख्यधारा की फिल्मों में अक्सर युद्ध, राजनीति और सामाजिक संघर्षों को केंद्र में रखा जाता है, वहीं ‘गवर्नर: द साइलेंट सेवियर’ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसकी कहानी का केंद्र बिंदु अर्थव्यवस्था है। यही पहलू निर्देशक चिन्मय मांडलेकर को इस फिल्म की ओर सबसे अधिक आकर्षित कर गया।
फिल्म के बारे में बात करते हुए चिन्मय मांडलेकर ने कहा था, “आमतौर पर हम युद्ध, प्राकृतिक आपदा, महामारी, दंगों और सामाजिक घटनाओं पर आधारित फिल्में देखते हैं, लेकिन अर्थव्यवस्था पर केंद्रित फिल्में बहुत कम बनती हैं।”
मांडलेकर के अनुसार, 1990 के दशक का आर्थिक संकट स्वतंत्र भारत के इतिहास के सबसे निर्णायक दौरों में से एक था। उनका मानना है कि उस समय लिए गए नीतिगत फैसलों ने देश के भविष्य को नई दिशा दी। फिल्म की कहानी को यथासंभव तथ्यपरक और विश्वसनीय बनाए रखने के लिए उन्होंने भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा उपलब्ध कराए गए अभिलेखों और दस्तावेज़ों का अध्ययन किया, ताकि उस समय की आर्थिक व्यवस्था और निर्णय प्रक्रिया को गहराई से समझकर पर्दे पर सटीक रूप में प्रस्तुत किया जा सके।
इस अंतरराष्ट्रीय सीए दिवस पर मनोज बाजपेयी अभिनीत ‘गवर्नर: द साइलेंट सेवियर’ केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि भारत के आर्थिक इतिहास के उस महत्वपूर्ण अध्याय से परिचित होने का अवसर भी है, जिसे बड़े पर्दे पर बहुत कम दिखाया गया है। वित्त, आर्थिक नीतियों और देश की दिशा बदल देने वाले ऐतिहासिक निर्णयों में रुचि रखने वाले दर्शकों के लिए यह फिल्म एक सार्थक और विचारोत्तेजक अनुभव साबित होती है।


