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74 प्रतिशत छात्र तनाव में: नए डिजिटल टूल से समय रहते मिलेगी मदद
• भारत की पहली सांस्कृतिक रूप से प्रमाणित डिजिटल मेंटल हेल्थ असेसमेंट सिस्टम ने छात्रों में तनाव और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी गंभीर चुनौतियों का किया खुलासा
इंदौर, 25 जुलाई 2026। जाने-माने मनोचिकित्सक और शोधकर्ता प्रो. अमरेश श्रीवास्तव के नेतृत्व में दिल्ली और मुंबई के विशेषज्ञों की टीम ने भारतीय छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर एक बड़ा अध्ययन किया है। इस अध्ययन में छात्रों के बीच तनाव और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी चिंताजनक स्थिति सामने आई है। साथ ही, शोधकर्ताओं ने छात्रों की समय रहते पहचान और सही मदद के लिए एक नया डिजिटल सिस्टम भी तैयार किया है।
1000 छात्रों पर किए गए इस अध्ययन में पाया गया कि करीब 74 प्रतिशत छात्र तनाव से जूझ रहे हैं, जबकि इनमें से 14 प्रतिशत छात्र गंभीर तनाव का सामना कर रहे हैं। अध्ययन में यह भी सामने आया कि 6 प्रतिशत छात्रों में गंभीर मानसिक स्वास्थ्य संबंधी लक्षण पाए गए, जबकि 5 प्रतिशत छात्रों में आत्महत्या के विचार या ऐसे संकेत मिले, जिनके लिए तुरंत मनोचिकित्सक की मदद जरूरी हो सकती है। इसके अलावा 37 प्रतिशत छात्रों की मानसिक चुनौतियों का सामना करने की क्षमता कम पाई गई। वहीं 57 प्रतिशत छात्रों को पढ़ाई, ध्यान लगाने, मोटिवेशन बनाए रखने, अच्छी नींद लेने और लोगों से जुड़ने जैसी रोजमर्रा की चीजों में परेशानी हो रही थी।
अध्ययन के मुताबिक छात्रों में सबसे ज्यादा देखने वाली मानसिक समस्याओं में किसी भी काम में रुचि कम होना (38 प्रतिशत), दूसरों पर शक करना (35 प्रतिशत), लगातार उदास रहना (21 प्रतिशत) और हर समय चिंता में रहना शामिल हैं। वहीं दोस्त बनाने में दिक्कत (26 प्रतिशत), पढ़ाई का दबाव (23 प्रतिशत), लगातार तनाव (25 प्रतिशत), बचपन में बुलिंग का शिकार होना (16 प्रतिशत) और भेदभाव का सामना करना (15 प्रतिशत) मानसिक स्वास्थ्य पर असर डालने वाले प्रमुख कारणों के रूप में सामने आए।
इन नतीजों के आधार पर शोधकर्ताओं ने मेंटल हेल्थ असेसमेंट स्केल्स फॉर स्टूडेंट्स(मास) तैयार किया है। यह भारत का पहला व्यापक और सांस्कृतिक रूप से प्रमाणित डिजिटल मेंटल हेल्थ असेसमेंट सिस्टम है। यह सिस्टम छात्रों को नॉर्मल, माइल्ड, मॉडरेट और सीवियर जैसी चार कैटेगरी में पहचानता है। इसके साथ ही गोपनीय स्क्रीनिंग, पर्सनल रिपोर्ट और जरूरत पड़ने पर सही विशेषज्ञ तक पहुंचने का रास्ता भी बताता है। अध्ययन के अनुसार 63 प्रतिशत छात्र केवल सेल्फ हेल्प प्रोग्राम से लाभ उठा सकते हैं, 31 प्रतिशत छात्रों को काउंसलिंग की जरूरत है, जबकि 6 प्रतिशत छात्रों को मनोचिकित्सकीय इलाज की आवश्यकता है। इससे साफ है कि यह सिस्टम समय रहते सही मदद तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभा सकता है।
प्रो. अमरेश श्रीवास्तव ने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में सबसे जरूरी है कि समस्या की पहचान समय रहते हो और उसे गंभीर बनने से पहले संभाल लिया जाए। मेंटल हेल्थ असेसमेंट स्केल्स फॉर स्टूडेंट्स (मास) छात्रों को अपनी मानसिक स्थिति और मानसिक मजबूती को समझने, समय पर मदद लेने और छोटी समस्याओं को बड़े संकट में बदलने से पहले रोकने में मदद करता है।
भारत में आज भी मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच बड़ी चुनौती बनी हुई है। मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे 70 से 90 प्रतिशत लोगों को समय पर इलाज नहीं मिल पाता। ऐसे में मास विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और नीति बनाने वालों के लिए एक भरोसेमंद और रिसर्च पर आधारित समाधान बनकर सामने आया है। वहीं छात्रों के लिए यह अपनी मानसिक स्थिति को गोपनीय तरीके से समझने, सही सलाह पाने और समय रहते मदद लेने का आसान माध्यम साबित हो सकता है।


