हृदय की धड़कन में बदलाव को न करें नजरअंदाज, समय पर जांच से गंभीर बीमारी का पता लगाना संभव

विश्व हृदय दिवस के उपलक्ष्य में यशोदा हॉस्पिटल्स के विशेषज्ञ ने दी हृदय स्वास्थ्य को लेकर महत्वपूर्ण जानकारी

इंदौर। आने वाले विश्व हृदय दिवस के उपलक्ष्य में यशोदा हॉस्पिटल्स, हैदराबाद के सीनियर कंसल्टेंट-कार्डियक इलेक्ट्रोफिजियोलॉजिस्ट डॉ. आदित्य प्रदीप मूलगांवकर ने हृदय से जुड़ी बीमारियों और असामान्य धड़कन को लेकर लोगों को जागरूक किया। उन्होंने कहा कि दिल की धड़कन का बार-बार तेज होना, अनियमित होना या रुक-रुककर चलना सामान्य मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। समय पर जांच और विशेषज्ञ से परामर्श के जरिए एरिदमिया (असामान्य हृदय धड़कन) जैसी स्थितियों की पहचान कर उचित उपचार किया जा सकता है। इस अवसर पर प्रबंधन का प्रतिनिधित्व करते हुए सर्कल इन-चार्ज श्री आनंद राठौर भी उपस्थित रहे।

आमतौर पर लोग दिल की धड़कन के असामान्य होने, अचानक तेज होने या रुक-रुककर चलने को तनाव, थकान या कमजोरी से जोड़कर टाल देते हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, बार-बार धड़कन का तेज या अनियंत्रित होना, अचानक चक्कर आना, बेहोशी जैसा महसूस होना या बिना किसी स्पष्ट कारण के अत्यधिक कमजोरी महसूस होना हृदय से जुड़ी गंभीर समस्या का संकेत हो सकता है। ऐसे लक्षणों को नजरअंदाज करने के बजाय समय पर चिकित्सकीय जांच कराना जरूरी है।

डॉ. आदित्य प्रदीप मूलगांवकर ने बताया कि यदि किसी व्यक्ति को इस तरह के लक्षण बार-बार महसूस होते हैं, तो उसे विशेषज्ञ चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए। समय पर की गई जांच से धड़कन में गड़बड़ी की वास्तविक वजह का पता लगाने में मदद मिलती है और मरीज की स्थिति के अनुसार उपचार की योजना बनाई जा सकती है।

उन्होंने बताया कि एट्रियल फिब्रिलेशन (Atrial Fibrillation), एसवीटी (SVT), वेंट्रिकुलर एरिदमिया और ब्रैडीएरिदमिया जैसी हृदय संबंधी स्थितियों का उपचार मरीज के लक्षणों और जांच रिपोर्ट के आधार पर किया जाता है। उपचार में आवश्यकतानुसार दवाओं के साथ आधुनिक इलेक्ट्रोफिजियोलॉजी तकनीकों और मेडिकल डिवाइसेज का भी उपयोग किया जाता है।

EPS और कैथेटर एब्लेशन से धड़कन की समस्या की सटीक पहचान और उपचार

इलेक्ट्रोफिजियोलॉजी स्टडी (EPS) के माध्यम से दिल की विद्युत प्रणाली और इलेक्ट्रिकल सिग्नल का अध्ययन किया जाता है। इस प्रक्रिया में विशेष कैथेटर की मदद से यह पता लगाने में सहायता मिलती है कि दिल की धड़कन में अनियमितता पैदा करने वाले इलेक्ट्रिकल सिग्नल कहां से उत्पन्न हो रहे हैं।

वहीं, कैथेटर एब्लेशन के जरिए दिल के उस छोटे हिस्से का उपचार किया जाता है, जहां से असामान्य इलेक्ट्रिकल सिग्नल उत्पन्न हो रहे होते हैं। आधुनिक चिकित्सा में 3D मैपिंग और उन्नत एब्लेशन तकनीकों की मदद से इस प्रक्रिया को अधिक सटीक तरीके से किया जा सकता है।

पेसमेकर और ICD भी उपचार का महत्वपूर्ण हिस्सा

डॉ. मूलगांवकर के अनुसार, कुछ मरीजों में हृदय की धड़कन बहुत धीमी हो जाती है। ऐसे मामलों में चिकित्सकीय स्थिति के अनुसार पेसमेकर की आवश्यकता हो सकती है। वहीं, गंभीर वेंट्रिकुलर एरिदमिया के जोखिम वाले मरीजों में ICD (इम्प्लांटेबल कार्डियोवर्टर डिफिब्रिलेटर) का उपयोग किया जाता है, जो गंभीर स्थिति में हृदय की खतरनाक धड़कन को नियंत्रित करने में मदद कर सकता है।

धड़कन में बदलाव को थकान समझकर न टालें

विशेषज्ञों का कहना है कि हृदय की धड़कन में बार-बार होने वाले बदलाव को केवल तनाव या थकान मानकर छोड़ना उचित नहीं है। चक्कर, बेहोशी जैसा महसूस होना, अचानक कमजोरी या लगातार अनियमित धड़कन जैसे लक्षण दिखाई देने पर समय पर चिकित्सकीय सलाह लेना महत्वपूर्ण है। शुरुआती जांच से समस्या की पहचान कर मरीज की स्थिति के अनुसार उपचार शुरू किया जा सकता है।

यशोदा हॉस्पिटल्स, हैदराबाद में हृदय की धड़कन से जुड़ी विभिन्न समस्याओं की जांच और उपचार के लिए आधुनिक इलेक्ट्रोफिजियोलॉजी सेवाएं उपलब्ध हैं।

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