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आत्मनिर्भर भारत के निर्माण के साथ-साथ घर वापसी करने वाले प्रवासी मजदूरों के पुनर्वास में भी सहायक है भारतीय मत्स्यपालन उद्योग
सितंबर 2020. संसाधनों की विविधता और असीम संभावनाओं के साथ, भारत में मत्स्यपालन बेहद अहम आर्थिक गतिविधि है जिसका बड़ी तेजी से विकास हो रहा है। इस क्षेत्र से जुड़े लोगों के लिए वैश्विक प्रगति के साथ कदम-से-कदम मिलाकर चलना महत्वपूर्ण है। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए, इस उद्योग से जुड़े अलग-अलग विषयों पर चर्चा करने के लिए भारत और दुनिया भर के कई उद्योग विशेषज्ञों ने आज एक वर्चुअल कॉन्क्लेव में भाग लिया।
इस कॉन्क्लेव में भाग लेने वाले उद्योग जगत के प्रतिष्ठित वक्ताओं में – अनमोल फ़ीड्स प्राइवेट लिमिटेड के प्रबंध निदेशक, श्री अमित सरावगी; एक्वा-फूड टेक्नोलॉजीज इंक के अध्यक्ष, श्री टिम ओ’कीफ; बेंचमार्क आर एंड डी (थाईलैंड) के वरिष्ठ वैज्ञानिक, डॉ. एंडी शिन; श्री उमाकांत आर., एक्वाकल्चर कंसल्टेंट, एशिया उपमहाद्वीप, USSEC; डॉ. पी. ई. विजय आनंद, सीनियर लीड, इमर्जिंग मार्केट डेवलपमेंट, USSEC; डॉ. वाई. बसवराजू, पूर्व डीन, कॉलेज ऑफ फिशरीज, मैंगलोर; श्री रामचंद्र राजू, अध्यक्ष, सोसाइटी फॉर इंडियन फिशरीज एंड एक्वाकल्चर (SIFA); श्री एंटोन इमिक, सीईओ, थिंक एक्वा; डॉ. मो. ग़ुलाम क़ादर ख़ान, प्रोफेसर, मत्स्य जीवविज्ञान एवं आनुवांशिकी विभाग, बांग्लादेश कृषि विश्वविद्यालय; श्री रेनलॉफी बुधई, राहड़जो, व्यापार विकास प्रबंधक, JALA, इंडोनेशिया; और श्री तरुण श्रीधर, पूर्व-सचिव, मत्स्य मंत्रालय, पशुपालन एवं डेयरी, भारत सरकार, शामिल थे।

इस कॉन्क्लेव में उपस्थित श्रोताओं को संबोधित करते हुए, अनमोल फ़ीड्स प्राइवेट लिमिटेड के प्रबंध निदेशक, श्री अमित सरावगी ने कहा, “मत्स्य पालन एक ऐसा क्षेत्र है जो अकेले 145 मिलियन लोगों को रोजगार देता है, साथ ही जीडीपी में इसका योगदान 1.07% है। राष्ट्रीय मत्स्य विकास बोर्ड के हालिया अनुमान के अनुसार, इस क्षेत्र ने निर्यात के जरिए 334.41 बिलियन रुपये की आय अर्जित की है।
पिछले कुछ सालों के दौरान एक्वाकल्चर, यानी मत्स्य पालन से न केवल सामाजिक-आर्थिक स्तर पर देश को पर्याप्त लाभ मिला है, जैसे कि पोषण स्तर में बढ़ोतरी के अलावा आय, रोजगार और विदेशी मुद्रा में वृद्धि, बल्कि इस्तेमाल नहीं होने वाले तथा कम इस्तेमाल होने वाले जमीन एवं जल संसाधनों को भी मत्स्य पालन के दायरे में लाया गया है।
प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत निर्यात और ग्रामीण रोजगार को बढ़ावा देने के लिए मत्स्य और झींगा पालन क्षेत्र की दिशा में किए गए प्रयास बेहद उत्साहजनक हैं। इस तरह के प्रयासों से ग्रामीण क्षेत्रों में उद्यमिता को बढ़ावा मिलेगा, साथ ही हमारे माननीय प्रधानमंत्री की परिकल्पना के अनुरूप भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए इस क्षेत्र से अर्थव्यवस्था तथा धन सृजन को प्रोत्साहन मिलेगा।
मत्स्य पालन रोजगार पैदा करने के साथ-साथ लोगों की आजीविका का एक बड़ा स्रोत बन सकता है, क्योंकि इन क्षेत्रों में कम निवेश के बावजूद अधिक लाभ अर्जित किया जा सकता है। यह प्रोटीन की उपलब्धता बढ़ाने, ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार का सृजन करने तथा खाद्य सुरक्षा के लक्ष्य को हासिल करने में मदद कर सकता है।
खास तौर पर पूरे देश में प्रवासी मजदूरों की घर वापसी की इन परिस्थितियों के बीच, मत्स्य एवं झींगा पालन इन प्रवासी मजदूरों के पुनर्वास में सहायक साबित हो सकता है तथा उनके लिए आजीविका का स्रोत बन सकता है।”
उन्होंने आगे बताया, “हमारे पड़ोसी देशों, नेपाल और भूटान में इसका व्यापार पर्याप्त मात्रा में होता है। हालांकि हम निर्यात संवर्धन पूंजीगत वस्तु योजना का पूरी तरह लाभ नहीं ले पा रहे हैं क्योंकि इसमें कमाई भारतीय मुद्रा में होती है। मैं इस मंच के माध्यम से सभी अधिकारियों से यह अनुरोध करना चाहता हूं कि, वे अनजाने में हुई इस विसंगति पर गौर करें और देश की अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने में हमारी मदद करें।”
बेंचमार्क आर एंड डी (थाईलैंड) के वरिष्ठ वैज्ञानिक तथा इस कार्यक्रम के मुख्य वक्ता, डॉ. एंडी शिन ने सत्र के दौरान कहा, “लोग एक्वाकल्चर के तरीकों से अनजान हैं और यह सबसे बड़ा खतरा है। उपचार के समय का बड़ी सावधानी से पालन किया जाना चाहिए। हर एक फार्म की परिस्थितियां और उसकी समस्याएं अलग-अलग हो सकती हैं। छोटी और बड़ी मछलियों की निगरानी और उनका उपचार अलग से किया जाना चाहिए।
उपचार करने से पहले सभी आवश्यक उपकरणों को अच्छी तरह से कीटाणुरहित करना बेहद जरूरी है। बिचौलियों के बहकावे में आए बिना किसी पशु चिकित्सक की सलाह लेना आवश्यक है। जैव सुरक्षा को बरकरार रखने के लिए आपातकालीन योजनाएं तैयार करें। मत्स्य पालन में टालमटोल और लापरवाही से बचना चाहिए।”
यह वर्चुअल कॉन्क्लेव तीन मुख्य विषयों पर केंद्रित था – सुरक्षित तरीके से उत्पादन सुनिश्चित करने के लिए स्वास्थ्य एवं जैव सुरक्षा पर विशेष ध्यान, मत्स्य पालन के तरीके में सुधार, तथा अधिकतम विकास एवं शानदार उत्पादन के लिए बेहतर पोषण। इस कॉन्क्लेव के मुख्य वक्ताओं ने जलीय जीवों के स्वास्थ्य एवं पोषण पर अपने विशाल अनुभव को साझा किया, जबकि पैनल के सदस्यों की चर्चा में इस बात पर ध्यान केंद्रित किया गया कि, विभिन्न देशों और संगठनों ने कैसे महामारी को पीछे छोड़ दिया है और आगे की राह पर चल रहे हैं।
इस उद्योग में घर वापसी करने वाले प्रवासी मजदूरों को रोजगार देने की क्षमता है, साथ ही यह आर्थिक रूप से कमजोर तबके के लोगों के लिए रोजी-रोटी की व्यवस्था कर सकता है। इसमें देश की अर्थव्यवस्था को नए सिरे से खड़ा करने तथा ग्रामीण भारत की आर्थिक स्थिति को बदलने की क्षमता है।
मत्स्य उत्पादन के लिहाज से भारत का पूरी दुनिया में तीसरा स्थान है, जबकि एक्वाकल्चर में यह दूसरे स्थान पर है। विश्व स्तर पर मत्स्य-विविधता का 10 प्रतिशत से अधिक भारत में मौजूद है। गहरे समुद्र से लेकर पहाड़ों पर बनी झीलों तक के विविधतापूर्ण जल संसाधन, तथा मछली और शेल्फिश (सीप) प्रजाति के संदर्भ में वैश्विक जैव विविधता का 10% से अधिक भारत में मौजूद है, और इस देश में आजादी के बाद से मछली उत्पादन में लगातार बढ़ोतरी हुई है।
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एग्रीकल्चर इकोनॉमिक्स एंड पॉलिसी रिसर्च की रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2021 तक एक्वाकल्चर के उत्पादों की अनुमानित मांग 11.80 मिलियन मीट्रिक टन हो जाएगी। वित्त-वर्ष 1950 में मछली उत्पादन 800,000 टन था, जो 1990 के दशक की शुरुआत में बढ़कर 4.1 मिलियन टन हो गया। 1990 से 2010 की अवधि में, भारतीय मछली उद्योग में तेजी आई, तथा खारे एवं मीठे पानी में मछली उत्पादन लगभग 8 मिलियन मीट्रिक टन तक पहुंच गया।
दो दशकों की अपनी इस यात्रा में, अनमोल फ़ीड्स ने अत्याधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल के साथ-साथ बेहतर पशु आहार, पशुधन के स्वास्थ्य की देखभाल, तथा प्रबंधन एवं व्यापार के लिए अभिनव प्रक्रियाओं और नीतियों के माध्यम से फ़ीड इंडस्ट्री, यानी कि पशु-चारा उद्योग के स्वरूप को बदलने का प्रयास किया है।
किसानों के कौशल का विकास करना, अधिकतम उत्पादन के लिए उन्हें आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल का प्रशिक्षण देना कंपनी के मूल उद्देश्यों में से एक है, जिससे किसानों के साथ-साथ बड़े पैमाने पर देश को भी लाभ मिल सके।
मौजूदा परिस्थितियों की वजह से मजदूरों की बड़े पैमाने पर घर वापसी हुई है, और ऐसी स्थिति में उनके लिए आजीविका एवं रोजगार के अवसर पैदा करना बेहद महत्वपूर्ण है। पशुपालन, विशेष रूप से मुर्गी पालन और एक्वाकल्चर (मछली एवं झींगा पालन) रोजगार पैदा करने के साथ-साथ लोगों की आजीविका का एक बड़ा स्रोत बन सकता है, क्योंकि इन क्षेत्रों में कम निवेश के बावजूद अधिक लाभ अर्जित किया जा सकता है।


