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जीवन रथ की लगाम कृष्ण के हाथों सौंप दें: डॉ. सलिल
इंदौर. संसार में रहते हुए भी भक्ति-भावना बनी रहना चाहिए. जीवन में सत्संग बहुत जरूरी है. श्रेष्ठ संगत होगी तो गंदी नाली का कीड़ा भी प्रभु के गले की माला तक पहुंच सकता है. जिस दिन अर्जुन की तरह हम भी अपने जीवन रथ की लगाम कृष्ण के हाथों सौंप देंगे, जीवन के किसी भी संग्राम में हमें पराजय का मुह नहीं देखना पड़ेगा. कलयुग की बुराईयों से बचने के लिए भक्ति ही सबसे श्रेष्ठ और सहज-सरल माध्यम है.
ये दिव्य विचार है वृंदावन के भागवताचार्य डॉ. संजय कृष्ण सलिल के, जो उन्होने आज गीता भवन में अग्रवाल समाज केंद्रीय समिति द्वारा उदयपुर के नारायण सेवा संस्थान के सहायतार्थ आयोजित भागवत ज्ञानयज्ञ में व्यक्त किए. कथा श्रवण के लिए दिनों दिन भक्तों का सैलाब उमड़ रहा है. बड़ी संख्या में श्रद्धालु दिव्यांगों की मदद के लिए आर्थिक सहयोग भी दे रहे हैं. भागवताचार्य डॉ. सलिल ने ग्यारह सौ दिव्यांगों के ऑपरेशन कराने का संकल्प किया है.
कथा शुभारंभ के पूर्व समाजसेवी प्रेमचंद गोयल, अरविंद बागड़ी, बालकृष्ण छाबछरिया, राजेश बंसल, निर्मल गुप्ता श्रीगंगा, नंदकिशोर कंदोई, डॉ. निर्मल नरेड़ी,राजेश इंजीनिंयर, रामबिलास राठी, राजू समाधान, राजेश गर्ग, अजय मंगल, तृप्ति गोयल,श्रीकिशन गुप्ता आदि ने व्यासपीठ का पूजन किया. मुख्य यजमान राधेश्याम-शकुंतला बांकड़ा एवं मनोज-लीना बंसल ने संतश्री की अगवानी की.
भगवान को अभिमान रहित भक्ति आती है रास
विद्वान वक्ता ने कहा कि हम सब जीवन में सुख और आनंद ही चाहते हैं. दुख कोई नहीं चाहता. कुंती ने भगवान से दुख मांगा था ताकि ठाकुर की स्मृति हमेशा बनी रहे। सुख के दिनों में हम भगवान को भुला देते हैं. जिस परमात्मा ने हमें सबकुछ दिया है, उसके प्रति शुक्रिया अदा करने का वक्त भी हमारे पास नहीं रहता, लेकिन जैसे ही कोई संकट आता है, हम भगवान को रटने-जपने लगते है. भक्ति करते भी है तो उसमें हमारे धन, वैभव और रूतबे का अहंकार भरा रहता है. याद रखें कि भगवान को अभिमान रहित भक्ति ही रास आती है.


