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ये रामकृष्ण की पावन भूमि जहाँ प्रेम का दरिया बहता है
इंदौर. अब हर फैसला हो जनता का… कोई नहीं सवाली हो… इन दुष्ट दरिन्दों और आतंकी से ये पावन भूमि खाली हो… ये रामकृष्ण की पावन भूमि जहाँ प्रेम का दरिया बहता है… आँसुओं से भरे समन्दर सूखे हैं… आज दरिन्दे दरवाजे पर… मौत नाच रही गली गलियारों में… अब तो जाग जाओ रे… जीना है तो मरना सीखो… तू$फानों से टकराना सीखो… आँसू पोंछो माँ बहनों के… अणु शक्ति बन जाओ रे… अब तो जाग जाओ रे…
रामनाथ मालवीय ने वर्तमान में बिगड़ते परिवेश पर तंज़ करती और जनता से जागने का आव्हान करती मार्मिक रचना सुनाई जिसे नेहरू पार्क में अखंड संडे द्वारा आयोजित मुशायरे में काफी सराहा गया.
डॉ. गगन भाटी ने समझाईश देती $गज़ल सुनाकर दाद बटेारी – जि़ंदगी में नर्मी रखिये, दिल में जज़्बात रखिये, अगर बड़े हो आप तो बड़ो वाली बात रखिये. पूनमचंद यादव ने शेर – हर दर्द महसूस किया है मैंने दिल में… ज़ख़्म अपने दिखा भी नहीं सकता ज़माने को सुनाकर दाद बटोरी. बलवन्त नाथ योगी ने अपने अंर्तमन की पीड़ा रचना में व्यक्त की – वाह रे भगवान कैसी तेरी दुनिया और कैसे इन्सान… आदमी क्यों बन गया शैतान.
दिनेशचंद्र तिवारी ने जि़दगी के $फलसफ़े को बयां करते मुक्त क सुनाये – ख़्वाबों को ज़मी पर उतार कर देखो, जि़ंदगी को दिल से पुकार कर देखो. सज्जन जैन, देवीलाल गुर्जऱ, डॉ. रमेश चन्द्र, दिनेश शर्मा, मदनलाल अग्रवाल, हंसा मेहता रमेश धवन हरिलाल यादव आदि ने भी अंर्तमन को छुती हुई रचनाओं का पाठ कर दाद बटोरी.


