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कभी मुस्कुरा के मिला करो कभी खिल खिला के हँसा करो
अंखडे संड का मुशायरा आयोजित
इंदौर विश्व हास्य योग दिवस के अवसर पर नेहरू पार्क में अखंड संडे द्वारा 1158 वां मुशायरा आयोजित किया गया जिसमें हास्य व्यंग की रचनाओं एवं फूलझडिय़ों पर खूब ठहाके लगे.
मुकेश इन्दौरी ने गज़ल कहाँ एक जैसी है जि़न्दगी कभी धूप तो कभी छांव है/ कभी जि़न्दगी से निराश तुम मेरे दोस्तों न हुआ करो/ ये बुझी बुझी सी नज़र है क्यों ये उदास चेहरा है किसलिये/ कभी मुस्कुरा के मिला करो कभी खिल खिला के हँसा करो सुनाकर दाद बटोरी।
दिनेशचंद्र तिवारी ने – दिल को गुलशन सा सजा लीजिये/ बस थोड़ा सा मुस्कुरा दीजिये। अल्का जैन ने हास्य की फूलझड़ी सुनाकर गुदगुदाया- मैं मुस्कुरा तो दँू मगर नकली दाँत गिरने का डर है।
अनूप सहर ने भी मज़दूरों के अंर्तमन की पीड़ा को व्यक्त किया- किसी ने कहा मैं मुल्क की तकदीर हूँ/ किसी ने कहा मैं मुल्क की पहचान हूँ/ जीया उम्र भर पाँव में जंजीर लिये/ तरसता रहा धूप में छाँव के लिये/ हाँ मैं मज़दूर हूँ।
चंद्रशेखर चिरोले ने मजदूरों की व्यथा को रचना में पिरोकर सुनाया- न तन पे कपड़ा न पेट में रोटी/ तिलमिलाती धूप में मिट्टी को बना दूँ मोती/ न छत है न झोपड़ी टूटी है मेरी चारपाई/ आजा़दी तो घर घर आई/ पर मेरे हिस्से में पहले राजाओं की फिर अंग्रेजों की और अब नेताओं की गुलामी आई।
सज्जन जैन, अशफाक हुसैन, संजय जैन, भीमसिंह पंवार, रमेश धवन, अनिता सेरावत आदि ने भी रचना पाठ किया. संचालन मुकेश इन्दौरी ने किया. आभार श्याम बागोरा ने माना.


