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लक्षणों को पहचानेंगे तभी सही समय पर मिलेगा निदान
इनक्लोजिकल स्पॉन्डिलाइटिस और लुपस अवेयरनेस सेमिनार में बोले विशेषज्ञ
इंदौर. लुपस रिह्युमेटोलॉजी की सौ बीमारियों में से एक है. पुरुषों की तुलना में महिलाओं में इसका खतरा 9 गुना अधिक होता है। अध्ययनों के मुताबिक हर 2000 में से एक महिला को लुपस होता है. कई लड़कियों का तलाक का कारण भी यही बीमारी है. शहर की बात करे तो जागरूकता के आभाव में लुपस के 80 प्रतिशत केसेस अभी भी डॉक्टर्स के सामने नहीं आए हैं.
यह जानकारी रविवार सुबह प्रेस क्लब में हुए इनक्लोजिकल स्पॉन्डिलाइटिस और लुपस डे के उपलक्ष्य में रिह्युमेटोलॉजिस्ट डॉ. सौरभ मालवीय और इंदौर मेडिकल असोसिएशन द्वारा कराए गए अवेयरनेस सेमिनार के दौरान विशेषज्ञों ने बताई. कार्यक्रम के लिए खासतौर पर दिल्ली से आए रिह्युमेटोलॉजी विशेषज्ञ डॉ बिमलेश धर पांडे ने बताया आज भी 90 प्रतिशत मामलों में मरीज और डॉक्टर दोनों ही जागरूकता के अभाव में इस बीमारी के लक्षण नहीं समझ पाते. इस तरह के केसेस में लुपस के कारण मरीज के अन्य अंग प्रभावित हो जाते हैं और कई बार मरीज अपने वे अंग खो भी देते हैं. सेमिनार के दौरान भी ऐसे कई मरीज आए थे जिन्होंने अपनी आंखे खो दी.
डॉक्टर की निगरानी में ले पैन किलर
रिह्युमेटोलॉजिस्ट डॉ. सौरभ मालवीय ने बताया कि इनक्लोजिकल स्पॉन्डिलाइटिस में मरीज को इतना अधिक दर्द होता है कि वे अपने रोजमर्रा के काम भी नहीं कर पाते. दर्द निवारक दवाइयां इसके इलाज का हिस्सा है पर कई बार मरीज इसके दुष्प्रभावों से डरकर इन्हें लेने से डरते हैं, जिससे इलाज में व्यवधान आता है. इनक्लोजिकल स्पॉन्डिलाइटिस में दर्द निवारक दवाइयां जरूर लें पर डॉक्टर की निगरानी में. इसी तरह लुपस में शुरूआती इलाज के समय बिना स्ट्रेरॉयड वाली दवाइयों के इलाज संभव नहीं जबकि बाद में सामन्य
दवाई से इलाज होता है इसलिए जब इलाज के लिए डॉक्टर के पास पहुंचे तो पूरी जिम्मेदारी उन पर छोड़ कर निश्चिन्त हो जाए.
लक्षणों को ना करे नजरअंदाज
दिल्ली से आए डॉ इंद्रजीत अग्रवाल ने बताया कि आधी रात को यदि शरीर में दर्द के साथ अकडऩ महसूस हो और करवट भी ना लेते बने तो इन लक्षणों को नजरअंदाज ना करे. ये इनक्लोजिकल स्पॉन्डिला
इटिस के लक्षण हो सकते हैं। इन्हे महसूस करते ही डॉक्टर को दिखाए. अधिकांश मामलों में दवाई और कसरत से राहत मिल जाती है, आराम ना मिलने पर ही बायोलॉजिकल दवाइयों की जरूरत होती है. धुप में निकलने पर चेहरे पर लाल चकते होना, मुँह में छाले और बाल झडऩे जैसे लक्षण लुपस की ओर इशारा करते हैं. लुपस को सही समय पर पहचानना बहु त जरुरी है क्योकि देरी होने पर इसके कारण हार्ट में ब्लॉकेज हो जाता है, जिससे इलाज के दौरान कई बार हार्ट अटैक का खतरा भी बढ़ जाता है। बच्चों में भी लुपस का खतरा होता है इसलिए यदि बच्चे बाहर खेलने में आनाकानी करे या कोहनी में चोट के कारण दर्द की शिकायत करे तो एक बार चिकित्सकीय सलाह जरूर ले.
इटिस के लक्षण हो सकते हैं। इन्हे महसूस करते ही डॉक्टर को दिखाए. अधिकांश मामलों में दवाई और कसरत से राहत मिल जाती है, आराम ना मिलने पर ही बायोलॉजिकल दवाइयों की जरूरत होती है. धुप में निकलने पर चेहरे पर लाल चकते होना, मुँह में छाले और बाल झडऩे जैसे लक्षण लुपस की ओर इशारा करते हैं. लुपस को सही समय पर पहचानना बहु त जरुरी है क्योकि देरी होने पर इसके कारण हार्ट में ब्लॉकेज हो जाता है, जिससे इलाज के दौरान कई बार हार्ट अटैक का खतरा भी बढ़ जाता है। बच्चों में भी लुपस का खतरा होता है इसलिए यदि बच्चे बाहर खेलने में आनाकानी करे या कोहनी में चोट के कारण दर्द की शिकायत करे तो एक बार चिकित्सकीय सलाह जरूर ले.शर्तिया इलाज वालों के चक्कर में ना आए
सेमिनार के दौरान इंदौर मेडिकल एसोसिएशन के डॉक्टर भी उपस्थित थे. डॉ. मालवीय के साथ दिल्ली से आए डॉ. पाण्डेय और डॉ. अग्रवाल ने आईएमए के साथ मिल कर डॉक्टर अवेरनेस प्रोग्राम भी किया जिसमें शहर के 150 डॉक्टर ने हिस्सा लिया. सेमिनार में डेंटिस्ट, फिजियोथैरेपिस्ट और कार्डियोलॉजिस्ट भी मौजूद थे जिन्होंने लुपस व इनक्लोजिकल स्पॉन्डिलाइटिस में ध्यान रखे जाने वाली बातों पर चर्चा की. उन्होंने बताया इन दोनों ही बीमारियों का असर दांत और दिल सहित शरीर के अन्य अगों पर भी दिखाई देता है. कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. भारत रावत ने कहा कि इन दोनों ही बीमारियों में मरीज शर्तिया इलाज का दवा करने वाले लोगों के संपर्क में आकर समय नष्ट ना करे बल्कि सीधे डॉक्टर के पास जाए. शर्तिया इलाज जैसी कोई चीज नहीं होती। हम डॉक्टर्स को भी सिर्फ 80 प्रतिशत ज्ञान होता है बाकि 20 प्रतिशत हम अनुभव से सीखते हैं।


