परीक्षा सुधार के साथ शिक्षा को भी रोजगारोन्मुखी बनाना होगा

डॉ. ए. के. द्विवेदी

वरिष्ठ होम्योपैथ चिकित्सक एवं शिक्षाविद्, इंदौर, सदस्य, एथिकल कमेटी, CCRH, आयुष मंत्रालय, भारत सरकार
सदस्य, वैज्ञानिक सलाहकार समिति (SAC), NEIAH, शिलांग, कार्य परिषद सदस्य, देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर (म.प्र.)

केवल परीक्षा सुधार कर देने से शिक्षा व्यवस्था की सभी चुनौतियों का समाधान नहीं होगा। राष्ट्रीय शिक्षा नीति–2020 का मूल उद्देश्य शिक्षा को गुणवत्तापूर्ण, कौशल आधारित और रोजगारोन्मुखी बनाना है। इसलिए अब आवश्यकता है कि इस नीति को प्रभावी रूप से धरातल पर लागू किया जाए।

उच्च शिक्षण संस्थानों को केवल कार्यक्रमों और औपचारिक आयोजनों तक सीमित रहने के बजाय विद्यार्थियों के कौशल विकास, रोजगार, स्वरोजगार और उद्यमिता को प्राथमिकता देनी चाहिए। शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल डिग्री प्रदान करना नहीं, बल्कि युवाओं को आत्मनिर्भर बनाना भी है। यदि शिक्षित युवाओं को रोजगार के पर्याप्त अवसर नहीं मिलेंगे, तो बेरोजगारी के साथ अनेक सामाजिक और आर्थिक चुनौतियाँ भी बढ़ेंगी।

परीक्षा सुधार के लिए टास्क फोर्स समिति का गठन स्वागतयोग्य और सराहनीय पहल है। अब आवश्यकता इस बात की है कि समिति केवल नीतिगत सुझावों तक सीमित न रहे, बल्कि जमीनी स्तर पर प्रभावी सुधार सुनिश्चित करे। परीक्षा प्रणाली पारदर्शी, विश्वसनीय और समयबद्ध होनी चाहिए।

सभी परीक्षा आयोजित करने वाले उच्च शिक्षण संस्थानों एवं एजेंसियों को निर्धारित समय-सीमा में परिणाम घोषित करने चाहिए। प्रश्नपत्र लीक होने जैसी घटनाओं पर पूर्णतः रोक लगनी चाहिए तथा परीक्षाओं के निरस्तीकरण की नौबत नहीं आनी चाहिए। इसके लिए आधुनिक तकनीक, मजबूत निगरानी व्यवस्था और जवाबदेही सुनिश्चित करना आवश्यक है।

निस्संदेह यह कार्य चुनौतीपूर्ण है, लेकिन असंभव नहीं। दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति, प्रभावी प्रशासनिक व्यवस्था और सभी संबंधित पक्षों के समन्वित प्रयासों से ऐसी परीक्षा एवं शिक्षा प्रणाली विकसित की जा सकती है, जो युवाओं का विश्वास मजबूत करे और उन्हें बेहतर भविष्य प्रदान करे।

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