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आई भविष्य का मजबूत औजार है, लेकिन इसका सही उपयोग नहीं किया गया तो यह खतरनाक भी है
फरवरी में दिल्ली में होने जा रही इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट-2026 की प्री समिट में विभिन्न क्षेत्रों के दिग्गजों ने अपने विचार साझा किए
इंदौर। फरवरी में दिल्ली में होने जा रहे इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट-2026 के तहत देश के कई शहरों में प्री समिट आयोजित की जा रही है। इसके तहत एक प्री समिट सोमवार को इंदौर में आयोजित की गई। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), गवर्नेंस, पुलिसिंग, शिक्षा और सामाजिक प्रभाव को लेकर गहन मंथन हुआ। देश-विदेश से जुड़े विशेषज्ञों ने साफ कहा कि एआई भविष्य का मजबूत औजार है, लेकिन मानवीय विवेक, स्थानीय डेटा और जवाबदेही के बिना इसका उपयोग खतरनाक हो सकता है।
अर्थसंगिनी एनजीओ और सेंटर ऑफ पॉलिसी रिसर्च एंड गवर्नेंस (सीपीआरजी) द्वारा द पार्क में आयोजित कार्यक्रम में एआई का गवर्नेंस में उपयोग और इससे जुड़ी नीतियों पर चर्चा हुई। इसमें आईआईटी इंदौर के डीन प्रो. संदीप चौधरी, डीएवीवी के कुलपति डॉ. राकेश सिंघई, सीपीआरजी के डायरेक्टर रामानंद, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अरिजीत पात्रा, आईएएस हिमांशु प्रजापति, इंडस्ट्री वेटरन विनय छजलानी और मीडिया से अंशुमन तिवारी, एडिशनल पुलिस कमिश्नर (कानून) अमित सिंह, अमित चटर्जी सहित कई वरिष्ठ अधिकारी और विशेषज्ञ शामिल थे।
कार्यक्रम की शुरुआत अर्थसंगिनी की फाउंडर शानू मेहता ने मॉडरेटर के रूप में की। उन्होंने कहा, तकनीक पहले बाजार में आती है, फिर समाज अपनाता है और सरकार बाद में नियम बनाती है। उन्होंने यूपीआई का उदाहरण देते हुए कहा कि कैसे एक प्रयोग देश की वित्तीय रीढ़ बन गया। अतीत में हमने नहीं सोचा था कि 2014 का चुनाव सोशल मीडिया से प्रभावित होगा, सर्च इंजन भरोसे का पैमाना बनेंगे या बैटरी कारें राष्ट्रीय नीति का हिस्सा बनेंगी। बदलाव पहले बाजार से शुरू होता है, फिर समाज अपनाता है और अंत में सरकार नियम बनाती है। मीडिया को बताया कि प्री समिट में चर्चा के दौरान आए सुझावों को इंडिया एआई समिट में रखा जाएगा।
ऑक्सफोर्ड से पीएचडी स्कॉलर और ग्लासगो विश्वविद्यालय के सबसे युवा एसोसिएट प्रोफेसर रहे डॉ. अरिजीत पात्रा ने कहा कि भारत एआई टैलेंट और ट्रेनिंग डेटा का सबसे बड़ा सप्लायर है, लेकिन इसके फायदे भारत के गांवों, छोटे शहरों और नगर निगमों तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। उन्होंने चेताया कि वैश्विक एआई मॉडल शहरी उच्च-मध्यम वर्ग के डेटा पर आधारित हैं, जिससे ग्रासरूट भारत कोडेड आउट हो जाता है। यह स्थिति औपनिवेशिक दौर जैसी है, जहां कच्चा माल बाहर और तैयार माल महंगे दामों पर वापस आता है।
अमित सिंह ने बताया कि यदि सरकार एआई-सक्षम सिस्टम उपलब्ध कराए तो पुलिस CCTNS और FRV-112 डेटा के जरिए अपराध के हॉटस्पॉट पहचान सकती है। उन्होंने कहा, इंदौर पुलिस पहले से ही हीट मैप बना रही है और ड्रोन, फुट पेट्रोलिंग व वाहन पेट्रोलिंग को डेटा के आधार पर प्रभावी कर रही है।
संदीप चौधरी ने कहा कि मौजूदा एआई हिंदी-अंग्रेजी तक सीमित है और मालवी जैसी स्थानीय भाषाओं को नजरअंदाज करता है। हम अपने छात्रों को ऐसे एआई समाधान बनाने के लिए प्रेरित करेंगे जो स्थानीय भाषाओं में काम करे।
मीडिया विशेषज्ञ अंशुमन ने सवाल उठाया कि क्या विदेशी एलएलएम भारत की स्थानीय समस्याओं को समझ सकते हैं? उन्होंने कैलिफोर्निया के संतरे बनाम नागपुर के संतरे की उपमा देते हुए एपिस्टेमिक सोवरेनिटी पर जोर दिया। उन्होंने एल्गोरिदम मोनोकल्चरिंग, पारदर्शिता और संदर्भ पर आगाह किया कि एआई अक्सर स्थानीय सोवरेनिटी (जैसे मध्य प्रदेश के लोगों की विशिष्टताएं) को नहीं पहचान पाता।
साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ अमित चटर्जी ने यूपीआई और ओटीपी फ्रॉड का जिक्र करते हुए कहा कि भारत की समस्याएं वैश्विक मॉडल से अलग हैं, इसलिए स्वदेशी समाधान जरूरी हैं। उन्होंने टेक स्टूडेंट्स के लिए एक साल के रिसर्च गैप ईयर का सुझाव भी दिया।
DAVV के कुलपति राकेश सर ने कहा, एआई सिर्फ एक टूल है। इंसान को मशीन से अधिक स्मार्ट रहना होगा। उन्होंने चिंता जताई कि छात्र एआई का उपयोग केवल परीक्षा पास करने के लिए कर रहे हैं, जबकि उन्हें उसकी कार्यप्रणाली समझनी चाहिए। विनय छजलानी ने सैंडबॉक्स फ्रेमवर्क का सुझाव देते हुए कहा कि बिना राजनीतिक डर के पायलट प्रोजेक्ट्स जरूरी हैं।


