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आहार का उपवास रखना आसान, शब्दों का भी उपवास रखना चाहिए: साध्वी मयणाश्रीजी
इंदौर. आहार का उपवास रखना तो आसान है लेकिन शब्दों का भी उपवास रखना चाहिए, हालांकि यह सबसे कठिन तपस्या है. शास्त्रों में मन, वचन और कर्म को आधार मानकर हमारे व्यक्तित्व को परिभाषित किया गया है. इनमें से वचन सबसे महत्वपूर्ण होता है. इतिहास साक्षी है कि अनेक बड़े युद्ध केवल बिगड़े वचनों के कारण ही हुए हैं. रोजमर्रा के जीवन में कड़वे शब्दों के प्रयोग से ही विवादों का जन्म होता है. इनसे बचने के लिए अपनी सामर्थ्य के अनुसार सप्ताह, माह या छह माह में एक बार मौन जरूर रखें.
साध्वी मयणाश्रीजी ने श्वेतांबर जैन तपागच्छ उपाश्रय ट्रस्ट एवं श्री पार्श्वनाथ जैन संघ रेसकोर्स रोड की मेजबानी में आराधना भवन पर आयोजित धर्मसभा में श्रावकों को संबोधित करते हुए यह आग्रह किया. उन्होंने कहा कि हमारे आगमसूत्रों की प्रमाणिकता को नासा के वैज्ञानिकों ने भी स्वीकार किया है. उनके अनेक शोध कार्य हमारे कल्पसूत्र एवं अन्य ग्रंथों पर आधारित हैं. ज्ञान की आराधना में पूरी सजगता और समग्रता होना चाहिए.
हमारे ऋषियों ने 84 आगम दिए थे लेकिन आक्रमणकारी मुगल शासकों ने युद्ध के दौरान उन ग्रंथों को जलाकर उनपर खाना पकाया, यह तथ्य भी इतिहास में दर्ज है. अब केवल 45 आगम हमारे मार्गदर्शन के लिए हमारी धरोहर बने हुए हैं. जिन शासन के प्रति हमारे क्या दायित्व और कर्तव्य हैं, इनसे हमारी नई पीढ़ी को अवश्य अवगत कराना चाहिए.
मौन का अभ्यास जरूरी
उन्होंने कहा कि हमें कब, कहां, क्यों और कैसे बोलना चाहिए, और कहां नहीं बोलना चाहिए, यह भी हमारे व्यक्तित्व का निर्धारण करने में सहायक होते हैं। जहां तक संभव हो, मौन का अभ्यास भी जरूरी है. इस अवसर पर ट्रस्ट के अध्यक्ष डॉ. प्रकाश बांगानी, सचिव यशवंत जैन, लाभमल सुराना, नरेंद्र रांका, विपिन सोनी, अशोक जैन पुष्परत्न आदि ने सभी श्रावक-श्राविकाओं की अगवानी की.


