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इंडोकॉन 2026 के तीसरे दिन हिप सर्जरी की जटिलताओं पर हुई गहन चर्चा
डॉ. डी.डी. तन्ना को मिला एनएचसी – इंडोकॉन ओरेशन सम्मान
इंदौर, 25 जनवरी 2026: इंडोकॉन 2026 के तीसरे दिन वैज्ञानिक सत्रों का मुख्य केंद्र हिप सर्जरी में आने वाली जटिल चुनौतियाँ रहीं, जिनमें पेरीप्रोस्थेटिक फ्रैक्चर, रिविजन प्रक्रियाएँ, इम्प्लांट विफलता, हड्डी की गुणवत्ता से जुड़ी कठिनाइयाँ और सर्जरी के बाद उत्पन्न होने वाले जोखिमों पर विस्तार से चर्चा की गई।
कॉन्फ्रेंस चेयरमैन डॉ. हेमंत मंडोवरा ने इंडोकॉन के तीसरे और अंतिम दिन के सेशंस के बारे में बताया कि दिन के पहले हिस्से में पेरी – इम्प्लांट और पेरी – प्रोस्थेटिक फ्रैक्चर की पहचान, बार बार होने वाले डिसलोकेशन, सीमेंटेड हिप रिप्लेसमेंट की तकनीकी बारीकियाँ और रिविजन सर्जरी की अनिवार्यता को क्रमबद्ध तरीके से समझाया गया।
विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि हिप सर्जरी में कई बार जटिलताएँ अचानक सामने आती हैं और कई स्थितियाँ पहले से मौजूद मेडिकल परिस्थितियों के कारण और अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाती हैं।
तीसरे दिन के सत्र विशेष रूप से उन वास्तविक परिस्थितियों पर केंद्रित रहे, जहाँ सर्जन को कठिन निर्णय लेने होते हैं और मरीज की स्थिति के अनुसार उपचार पद्धति बदलनी पड़ती है। यह दिन युवा सर्जनों के लिए व्यावहारिक सीख और जटिल मामलों की गहरी क्लिनिकल समझ का महत्वपूर्ण अवसर बना।
दिन का प्रमुख आकर्षण वरिष्ठ ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉ. डी. डी. तन्ना को दिया गया एनएचसी – इंडोकॉन ओरेशन सम्मान रहा। डॉ डी के तनेजा की उपस्थिति में कॉन्फ्रेंस की ऑर्गेनाइजिंग कमेटी के साथियों ने उन्हें सम्मानित किया।
अपने ओरेशन व्याख्यान में डॉ. डी डी तन्ना ने 1954 से आज तक ऑर्थोपेडिक सर्जरी की यात्रा को ऐतिहासिक और अनुभव – आधारित रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि शुरुआती दशकों में न उन्नत मशीनें थीं, न आधुनिक स्कैनर, और न ही उच्च स्तरीय उपकरण। उस दौर में उपचार मुख्यतः सर्जन की क्लिनिकल समझ, हाथों की जांच और बुनियादी साधनों पर आधारित था। सामान्य प्लास्टर, सीमित इंस्ट्रूमेंट और पारंपरिक तरीकों से फ्रैक्चर और हड्डी संबंधी उपचार किए जाते थे। उन्होंने यह भी बताया कि अपने 40 से अधिक वर्षों को उन्होंने ऑर्थोपेडिक सर्जरी के विकास, युवा डॉक्टरों के प्रशिक्षण और आधुनिक तकनीकों को अपनाने में समर्पित किया है, और इस अवधि में इस क्षेत्र ने जितनी प्रगति की है, वह पूरी पीढ़ी के प्रयासों का परिणाम है।
कॉन्फ्रेंस सेक्रेटरी डॉ अर्जुन जैन ने कहा कि डॉ तन्ना का संबोधन ऑर्थोपेडिक सर्जंस के लिए प्रेरणा और क्षेत्र के विकास की जीवंत कहानी है।
एक अन्य सत्र में डॉ. जॉन मुखोपाध्याय ने पेरीप्रोस्थेटिक फ्रैक्चर पर अपने सर्जरी के अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि हिप रिप्लेसमेंट के बाद होने वाला पेरीप्रोस्थेटिक फ्रैक्चर एक अत्यंत जटिल स्थिति होती है, जिसमें उपचार से पहले फ्रैक्चर के प्रकार, हड्डी की मजबूती, इम्प्लांट की स्थिति और मरीज की संपूर्ण स्वास्थ्य अवस्था का सूक्ष्म मूल्यांकन आवश्यक होता है। उन्होंने बताया कि किस प्रकार सही तकनीक का चयन, स्थिरता बनाए रखने की रणनीति और समय पर हस्तक्षेप बेहतर परिणाम सुनिश्चित करते हैं।

ऑल इंडिया मेडिकल इंस्टीट्यूट दिल्ली के पूर्व प्रमुख और ट्रॉमा सेंटर के डायरेक्टर डॉ. राजेश मल्होत्रा, ने हिप सर्जरी से पहले और बाद की आवश्यक सावधानियों पर विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने कहा कि सर्जरी की सफलता केवल प्रक्रिया पर नहीं, बल्कि मरीज की तैयारी और डॉक्टर की सतर्कता पर भी निर्भर करती है। डॉक्टरों के लिए उन्होंने यह स्पष्ट किया कि यदि कोई मरीज डायबिटिक है, तो उसकी सर्जरी तभी की जानी चाहिए जब उसकी शुगर पूरी तरह नियंत्रित हो, ताकि संक्रमण और अन्य जोखिम कम किए जा सकें। उन्होंने यह भी बताया कि ऑपरेशन के दौरान हड्डी के टूटने जैसी जटिलताओं से बचने के लिए सर्जन को हड्डी की गुणवत्ता, इम्प्लांट की फिटिंग और तकनीक पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
मरीजों के लिए उन्होंने कहा कि ऑपरेशन के बाद कुछ सप्ताह तक धूम्रपान और शराब का सेवन पूरी तरह रोकना आवश्यक है, क्योंकि ये दोनों आदतें हीलिंग को धीमा करती हैं और संक्रमण का खतरा बढ़ाती हैं। उन्होंने यह भी बताया कि सही तैयारी और सावधानियों के साथ आज युवा मरीज न केवल सामान्य जीवन में लौटते हैं बल्कि खेल और आउटडोर गतिविधियों में भी सुरक्षित तरीके से वापस आ सकते हैं।
कोर्स कन्वेनर डॉ अभिजीत पंडित ने बताया कि इंडोकॉन 2026 के तीन दिवसीय कार्यक्रम ने हिप सर्जरी के विभिन्न आयामों—हिप फ्रैक्चर प्रबंधन, संक्रमण नियंत्रण, पेरीप्रोस्थेटिक जटिलताओं, रिविजन सिद्धांत, आधुनिक तकनीक, 3D आधारित प्रक्रियाएँ और स्किल – लैब प्रशिक्षण — को एक ही मंच पर एकत्रित किया। उन्होंने उम्मीद की कि देशभर से आए सर्जंस की आधुनिक उपचार पद्धतियों, वास्तविक केस-आधारित निर्णयों और तकनीक के प्रभावी उपयोग की गहरी समझ बेहतर हुई होगी।


