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संसार में सुख केवल भ्रम है, असली सुख आत्मा में छिपा है
इन्दौर। संसार की सारी क्रियाएं सुख की खोज करना मात्र है सुख की परिभाषा अगर हम सही मायने में समझ जाएंगे तो सुख के भ्रम से बाहर निकल जाएंगे। क्योकि संसार मे सुख और कुछ नही केवल भ्रम है। असली सुख तो केवल हमारे अंदर मौजूद आत्मा में छिपा है। आत्मा में छिपे सुख को महसूस करो।
यह विचार महावीर बाग में खरतरगच्छ जैन श्री संघ के तत्वावधान में चल रहे चातुर्मास प्रवचन के दौरान आचार्य जिनमणिप्रभ सूरीश्वरजी महाराज ने सुख की असली परिभाषा क्या है, विषय पर बोलते हुए श्रावक श्राविकाओं को कही। उन्होंने कहा कि स्थितियां व परिस्थितियां हमेशा बदलती रहती है। कभी भी परिस्थितियों को दोष नही दिया जा सकता। मनुष्य अपने परिणामो के आधार पर सुखी और दुखी होता है। यह हमें सोचना है कि किसमे सुख है और किसमे दुख। सुख और दुख की खोज तो हमारा भ्रम है।
पांच प्रकार के सुख की व्याख्या
आचार्य जिनमणिप्रभजी सूरीश्वरजी महाराज ने कहा कि सुख को हम पांच प्रकार की व्याख्या से समझ सकते है। उन्होंने बताया कि एक प्रकार का सुख वह होता है जो निरन्तर चलने वाला होता है। इसे सातत्य सुख कहते है। दूसरा पूर्णता का होता है जिसमे सुख छणिक नही होकर पूर्ण होता है। तीसरा अपने हाथ मे, यानी जो सुख परिस्थितियों पर आधारित ना होकर अपने हाथ मे हो। चौथा वह जिसके परिणाम में दुख ना हो और पांचवां सुख वह है जो अपने से ज्यादा किसी ओर के पास ना हो। इनके पांचो तत्वों के आधार पर अगर हम सुख की परिभाषा सही सीख जायेगे तो हैम सुख के भ्रम में नही रहेंगे
मृग मरीचिका है सुख प्राप्ति का लक्ष्य
मनुष्य हमेशा सुख प्राप्ति के लिए संसार मे अनेक कर्म करता है। लेकिन जीवन मे मिलने वाला सुख अथवा दुख है वह हमारे कर्मो के ही परिणाम होते है। सुख प्राप्ति का हमारा लक्ष्य केवल एक मृग मरीचिका है और कुछ नही।
परिवर्तन हमारे सुख का आधार
दुनिया मे ऐसी कोई वस्तु नही जो निरंतर सुख प्रदान कर सके। जिस प्रकार एक ही वस्त्र को रोजाना पहनने से मन भर जाता वह अच्छा नही लगता। जैसे ही वस्त्र बदल लेते है तो हमे सुख की अनुभूति होती है। दूध का पहला गिलास पीने में जो सुख मिलता है वह चौथे या पांचवे गिलास में नही मिलता। दूध में अगर शक्ति होती तो पहले ओर आखिरी गिलास में भी हमे सुख मिलता।
जीवन जीने की कला है परमात्मा का जीवन
पमात्मा महावीर का जीवन जीवन जीने की कला है, जो हमे प्रेरणा देता है जीने की। उन्होंने जीवन मे आये दुखो में भी सुख को खोजा। परमात्मा की दृष्टि से अगर हम हमारी सोच रखेगे तो हमे हमेशा सुख की अनुभूति होगी
दुख की नही।
इच्छाओं का त्याग ही सुख
निमित्तों व कल्पनाओ के आधार पर ही हम सुख दुख का अहसास करते है। हमने अपनी इच्छाओं की पूर्ति को हो सुख माना है। इच्छाओं का संसार तो भट खतरनाक है। इसमें छणिक सुख ही मिलता है। एक भिखारी की तरह हैम परमस्तमा से याचना करते रहते है कि हमे सुख दे। हमारा सुख दुसरो पर आधारित सुख होता है। महावीर बाग में गुरूवार को संजय छाजेड़, महेश गोरेचा, हस्तीमलजी लोढ़ा, प्रमोद सेठी, अशोक छाजेड़, महेंद्र भंडारी, दिनेश ठाकुरिया, विजेंद्र चौरडिय़ा सहित हजारों की संख्या में श्रावक-श्राविकाएं मौजूद थे।
श्री जैन श्वेताम्बर खरतरगच्छ श्रीसंघ एवं चातुर्मास समिति के प्रचार सचिव संजय छांजेड़ एवं चातुर्मास समिति संयोजक छगनराज हुंडिया एवं डूंगरचंद हुंडिया ने जानकारी देते हुए बताया कि महावीर बाग में चातुर्मास पर्व के तहत शुक्रवार को महाराज साहब के प्रवचन साधार्मिक बंधुओ के प्रति हमारे कर्तव्य, विषय पर प्रवचन होंगे। वहीं शनिवार को श्रावक-श्राविकाओं द्वारा पूछे प्रश्नों के उत्तर महाराज जी देगे।


