- जल संरक्षण पर डॉ. ए.के. द्विवेदी के सुझावों की मंत्री तुलसी सिलावट ने की सराहना, अधिकारियों को शीघ्र कार्यवाही के दिए निर्देश
- Raj Kundra on the Ongoing Pornography Case: I am ready to give up my life if I am found guilty
- पुरी रथ यात्रा से पहले एयरटेल ने पूरे ओडिशा में अपने नेटवर्क को और मजबूत किया
- A Menstrual Hygiene Initiative Fueled Manushi Chhillar's Win for Miss India 2017 Crown
- जेएसडब्ल्यू एमजी मोटर इंडिया ने एमजी एडाप्ट का किया अनावरण
स्वर्ण सिंहासन पर विराजित हुए पोटलीवाले गणेश
इंदौर। गणेशजी के गगनभेदी जयघोष और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच जूनी इंदौर चंद्रभागा स्थित 400 वर्ष प्राचीन पोटलीवाले रिद्धि-सिद्धि चिंतामण गणपति को आज दिनभर चली शास्त्रोक्त क्रियाओं के बाद स्वर्णमंडित सिंहासन पर विराजित कर दिया गया।
लगभग 50 वर्गफीट आकार में स्थापित इस सिंहासन पर सूर्य एवं चंद्रमा के साथ मयूर, परियां, पताकाएं और गणेशजी की सवारी मूषकराज भी दिखाए गए हैं। अब जनवरी माह मंे सिंहासन की पृष्ठभूमि को रजतमंडित करने तथा गर्भगृह की छत पर स्वर्ण मंडित श्रीयंत्र स्थापित करने की योजना है।

मंदिर के पुजारी पं. गणेशप्रसाद पुराणिक ने बताया कि इस मंदिर की स्थापना लगभग 400 वर्ष पूर्व मारवाड़ से आए गडरियों ने उस वक्त की थी, जब शहर का क्षेत्रफल केवल 5 किमी परिधि में था और चारों कोनों पर चार अन्य मंदिर ही थे। आसपास जंगल था। उस दौरान गणेशजी की यह प्रतिमा यहां स्थापित की गई थी।
फिलहाल मंदिर के विस्तार का कार्य चल रहा है जिसे उड़ीसा से आए वही कारीगर अंजाम दे रहे हैं, जिन्होंने खंडवा रोड पर स्वामी नारायण का मंदिर बनाया है।
आज सुबह ओंकारेश्वर से आए विद्वान आचार्य पं. लोकेश अत्रे एवं पं. विश्वनाथ जोशी के निर्देशन में नए स्वर्ण सिंहासन पर पुष्प बंगले में गणेशजी को विराजित करने के पूर्व नवग्रह षोडश मातिृका पूजन एवं स्वस्ति वाचन कर अग्नि स्थापना सहित समस्त फलों के रस द्वारा पोटलीवाले गणेशजी का षोडशोपचार पूजन तथा अभिषेक कर स्वर्ण सिंहासन की शुद्धि के लिए अग्नि उत्तारण किया गया।
सर्वमंगल कामना से गणेश अथर्वशीर्ष हवन भी किया गया। संध्या को गणेशजी का मनोहारी श्रृंगार किया गया। सिंहासन की पूजा के साथ अभिषेक एवं आरती के आयोजन भी हुए जिनमें सैकड़ों श्रद्धालु शामिल हुए। मंदिर के संस्थापक ब्रम्हलीन गणेशानंद पुराणिक के चित्र का पूजन भी इस मौके पर किया गया। गणेशानंदजी का स्वर्गवास 106 वर्ष की आयु में वर्ष 2011 में हुआ। पुजारी परिवार के पं. दीपेश एवं पं. मयंक पुराणिक तथा अन्य परिजनों ने भी पूजन में भाग लिया।
मंदिर परिसर में शिवजी, हनुमानजी, मां आशापूर्णा एवं भैरव बाबा के मंदिर भी कई वर्षो पुराने समय से स्थापित हैं। अब मंदिर के विस्तार के बाद इन्हें भी नया कलेवर मिल सकेगा। आरती के पहले कांसे के एक सौ आठ दीपों को प्रज्जवलित कर गणेशजी की वंदना की गई। पं. दीपेश एवं पं. मयंक ने विद्वान आचार्यों को नए वस्त्र एवं दक्षिणा भेंटकर उनसे शुभाशीष प्राप्त किए।
मंदिर के पुजारी पं. पुराणिक के अनुसार दस वर्ष पूर्व करवाचौथ के दिन ही गणेशजी ने चोला छोड़ा था और तब पता चला था कि उनके चार में से एक सीधे हाथ मंे पोटली भी है। तब से ही उनका नाम पोटलीवाले गणेश हो गया है। संध्या को सैकड़ों दीपों की आभा के बीच स्वर्ण सिंहासन की सुनहरी चमक और भी निखर उठी तथा महाआरती के दौरान आए सैकड़ों भक्त अपने मोबाइल कैमरों में गणेशजी के इस नए स्वरूप को कैद करते रहे।


