- Varun Dhawan, Sanya Malhotra to Sharman Joshi: Actors We Want to Watch More on OTT
- क्रसुला फार्मास्युटिकल्स ने देवगुराडिया में 'पल्लव आरोग्य वन' का किया निर्माण; हरित और स्वस्थ भविष्य के लिए लगाए 500 पौधे
- बढ़ता प्रदूषण फेफड़ों के लिए सबसे बड़ा खतरा, नई तकनीकों से इलाज की बढ़ी उम्मीद
- Six franchises and one enduring star - The Akshay Kumar story on how he backed Bollywood's most memorable universes
- A Birthday Tribute to Geeta Kapur- 5 Best Moments of Geeta Kapur's incredible journey
बढ़ता प्रदूषण फेफड़ों के लिए सबसे बड़ा खतरा, नई तकनीकों से इलाज की बढ़ी उम्मीद
प्रदूषित हवा से सांस लेने की क्षमता हो रही प्रभावित
देश-विदेश के विशेषज्ञों ने साझा किए शोध और अनुभव
इंदौर। शहर में आयोजित चौथी ब्रोंकोपल्मोनरी वर्ल्ड कांग्रेस 2026 का समापन रविवार को हुआ। यह केवल एक वैज्ञानिक सम्मेलन नहीं रही, बल्कि यह तेजी से बिगड़ते पर्यावरण और उससे पैदा हो रहे श्वसन रोगों को लेकर गंभीर चेतावनी भी साबित हुई। दो दिनों तक ब्रिलियंट कन्वेंशन सेंटर में देश-विदेश के विशेषज्ञों की चर्चाओं का सबसे प्रमुख निष्कर्ष यही रहा कि यदि प्रदूषण पर प्रभावी नियंत्रण नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में सांस संबंधी बीमारियां भारत के लिए सबसे बड़ी स्वास्थ्य चुनौती बन सकती हैं। आधुनिक चिकित्सा तकनीकें मरीजों को नई जिंदगी देने में सक्षम हो रही हैं, लेकिन यदि प्रदूषण की रफ्तार नहीं थमी तो इलाज से अधिक जरूरत बचाव की होगी।
कांफ्रेंस में 750 से अधिक प्रतिनिधियों ने पंजीयन कराया। इनमें पल्मोनोलॉजिस्ट, क्रिटिकल केयर विशेषज्ञ, थोरासिक सर्जन, मेडिकल रिसर्चर और देशभर से आए युवा चिकित्सक शामिल रहे। अमेरिका, ब्रिटेन, नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश, मालदीव सहित कई देशों के विशेषज्ञों ने भी वैज्ञानिक सत्रों में भाग लिया।
कॉन्फ्रेंस के ऑर्गेनाइजिंग सेक्रेटरी प्रो. डॉ. रवि डोसी ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में ऐसी कई फेफड़ों की बीमारियों के इलाज में उल्लेखनीय सफलता मिली है, जिन्हें पहले लगभग लाइलाज माना जाता था। नई इंटरवेंशनल तकनीकों, अत्याधुनिक जांच पद्धतियों और बेहतर दवा प्रोटोकॉल ने मरीजों की जिंदगी की गुणवत्ता में बड़ा सुधार किया है। कांफ्रेंस के दूसरे और अंतिम दिन 30 से अधिक वैज्ञानिक व्याख्यानों में नई दवाओं, उपचार पद्धतियों और वैश्विक प्रोटोकॉल पर विस्तार से चर्चा हुई।
प्रदूषित हवा के सूक्ष्म कण फेफड़ों में हो रहे जमा
ऑर्गेनाइजिंग सेक्रेटरी प्रो. डॉ. रवि डोसी ने बताया कि प्रदूषित हवा में मौजूद सूक्ष्म कण धीरे-धीरे फेफड़ों में जमा होकर उनकी प्राकृतिक लचक को कम कर देते हैं। इससे सांस लेने की क्षमता प्रभावित होती है और लंबे समय में अस्थमा, सीओपीडी, पल्मोनरी फाइब्रोसिस तथा अन्य गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। अब कम उम्र के बच्चे भी प्रदूषण के कारण श्वसन रोगों की चपेट में आ रहे हैं। शहरों की व्यस्त सड़कों और चौराहों पर लोगों का मुंह ढंककर चलना या वाहनों के बंद शीशों के भीतर सफर करना इस समस्या की गंभीरता का प्रत्यक्ष संकेत है। यदि आने वाली पीढ़ियों को स्वस्थ भविष्य देना है तो प्रदूषण नियंत्रण केवल सरकारी जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सामाजिक अभियान बनना चाहिए।
विभिन्न शोधों पर हुई चर्चा
वैज्ञानिक सत्रों में बच्चों में सांस की नलियों के सिकुड़ने की समस्या, अस्थमा, टीबी के दवा-प्रतिरोधी जीवाणु, पल्मोनरी रिहैबिलिटेशन और क्रिटिकल केयर के नवीनतम शोधों पर भी विस्तार से चर्चा हुई।
इस दौरान डॉ. अतुल मेहता ने फेफड़ा प्रत्यारोपण के क्षेत्र में नई तकनीकों और मरीजों के लिए बढ़ी संभावनाओं पर व्याख्यान दिया। डॉ. सरबोन तहुरा ने बच्चों में ब्रोंकोस्कोपी के महत्व और सुरक्षित प्रक्रिया पर प्रकाश डाला। वहीं डॉ. अनंत मोहन ने एआईआरडी यानी इंटरस्टीशियल लंग डिजीज में रेडियोलॉजी की भूमिका और प्रारंभिक पहचान पर विस्तार से चर्चा की।


