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कैंसर से भी खतरनाक बीमारी बन चुकी है अप्लास्टिक एनेमिया
अप्लास्टिक एनेमिया पर राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन, जांच मे 48 प्रतिशत महिलाओं में मिली खून की कमी
इंदौर, मार्च 2022। आयुष मेडिकल वेलफेयर फाउंडेशन तथा एडवांस्ड होम्योपैथिक मेडिकल रिसर्च द्वारा अप्लास्टिक एनेमिया अवेयरनेस डे के अवसर पर रक्तजनित बिमारियों जैसे अप्लास्टिक एनेमिया, सिकल सेल एनेमिया एवं थैलेसिमिया पर राष्ट्रीय होम्योपैथिक सेमिनार का आयोजन किया गया है। कार्यक्रम के दौरान एक्सपर्ट ने होम्यौपेथी द्वारा इन बीमारियों के ईलाज पर अपने अनुभव बांटे।

इंदौर की एक निजी होटल में आयोजित कार्यक्रम का शुभारंभ सांसद शंकर ललवानी, जेल अधीक्षक श्रीमति अलका सोनकर , देवी अहिल्या विवि के योग विभाग प्रमुख डाॅ एस एस शर्मा ने की । इस मौके पर उपस्थित प्रतिभागियों को एमजीएम मेडीकल काॅजेज के डीन डाॅ संजय दीक्षित तथा प्रो सलिल भार्गव ने सर्टिफिकेट बांटे ,के मुख्य आतिथ्य में हुआ। अध्यक्षता डाॅ एके द्विवेदी ने की।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए डाॅ एके द्विवेदी ने कहा कि डॉ ए. के. द्विवेदी देश में एप्लास्टिक एनिमिया बीमारी के मामलों में वद्धि देखने को मिल रही है। यह एक ऐसी बीमारी जिसमें व्यक्ति के शरीर में खून का निर्माण बाधित हो जाता है। खून की कमी से कमजोरी, बैचेनी और संक्रामक बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है जो अंततः मरीज के लिए जानलेवा साबित हो सकती है। दरअसल इस बीमारी में बोनमैरो के भीतर रक्त बनने की प्रक्रिया प्रभावित होती है और धीरे-धीरे बोनमैरो में नई रक्त कोशिकाओं का निर्माण बंद हो जाता है। इस स्थिति में व्यक्ति को किसी भी तरह के बाहरी इंफेक्शन का खतरा बढ़ जाता है।

हमारे देश में मेडिकल सांख्यिकी या यूं कहे कि चिकित्सा संबंधी आंकडों काआज से यह बीमारी कैंसर से भी खतरनाक रूप ले चुकी है और ना केवल मरीज बल्कि उसके पूरे परिवार को विभिन्न स्तरों पर प्रभावित कर रही है। यह बीमारी नवजात शिशुओं से लेकर प्रौढ़ व्यक्तियों, युवतियों, किशोरियों या उम्रदराज महिलाओं किसी को भी अपनी गिरफ्त में ले सकती है। इसके शुरूआती लक्षण बेहद सामान्य होते हैं सलन चक्कर आना, सांस फूलना, कमजोरी महसूस होना, हाथ-पैरों में दर्द, सूजन, बार-बार बुखार आना या महिलाओं को माहवारी के समय अत्याधिक रक्तस्त्राव होना।
ये लक्षण कई अन्य बीमारियों से मेल खाते हैं लिहाजा ना केवल मरीज बल्कि कभी-कभी चिकित्सक भी इन लक्षणों को किसी अन्य बीमारी से जोड़कर देख लेते हैं। बुखार आना और उसके बाद रक्त की जांच में हीमोग्लोबिन और प्लेटलेट्स का कम हो जाना, इसे देखकर सबसे पहले मलेरिया और डेंगू जैसी बीमारियों का संशय होता है। स्वभाविक है कि पहले इन बीमारियों की जांच की जाती है। एक के बाद एक जांच के बावजूद जब बीमारी की पहचान नहीं हो पाती तब कही जाकर कोई विशेषज्ञ डॉक्टर एप्लास्टिक एनिमिया का संशय जताता है।
नतीजतन जब तक बीमारी की असल पहचान होती है मरीज बहुत कमजोर हो जाता है। किसी व्यक्ति को एप्लास्टिक एनिमिया है या नहीं। यह पता लगाने के लिए बोनमैरो बायोप्सी की जाती है। बोनमैरो बायोप्सी के बाद ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है। बोनमैरो बायोप्सी एक बहुत महंगी जांच है, इस जांच की सुविधा भी ज्यादातर छोटे शहरों में उपलब्ध ही नहीं है।
बोनमैरो बायोप्सी के बाद यदि एप्लास्टिक एनिमिया की पुष्टी हो जाए तो एलिपैथी इसके दो उपाय सूझाती है- पहला है बोनमैरो ट्रांसप्लांट और दूसरा एटीजी इंजेक्शन। बोनमैरो ट्रांसप्लांट एक बेहद जटिल प्रक्रिया है जिसमें आमतौर 40 लाख रूपये के इर्द-गिर्द खर्च आता है। इतनी बड़ी रकम का इंतजाम कर पाना किसी भी आम भारतीय परिवार के लिए बेहद मुश्किल काम है।
दूसरा विकल्प होता है एटीजी इंजेक्शन। इस इंजेक्शन का खर्च भी 8 लाख से 15 लाख तक आता है और यह भी बीमारी का स्थाई समाधान नहीं कर पाता। आमतौर पर इसका असर 1 से 3 साल तक रहता है। इस लाइललाज बीमारी को ठीक करने में होम्योपैथी असरदार साबित हुई है। होम्योपैथी में इस तरह की दवाएं उपलब्ध है, जिससे रक्त का निर्माण दोबारा शुरू हो सकता है।
कार्यक्रम में अप्लास्टिक एनेमिया बीमारी से निजात पा चुके बिहार के चंपारण निवासी मसिहा आजम भी आए । उन्होने बताया कि उन्हे कार्डिक प्रॉब्लम थीं। जिसके लिए वे एनजिओग्राफी कराने के लिए 20 नवंबर 2018 को फोर्टिस एस्कार्ट हॉस्पिटल रांची गये। उस वक्त उनका प्लेटलेट्स 60 हजार और हिमोग्लोबिन 10.5 ग्राम था। जब बोनमेरो की जांच से पता चला की अप्लास्टिक एनेमिया हो गया है। वहां के डॉक्टरों ने पटना रैफर कर दिया। उसके बाद पारस अस्पताल में 40 दिन तक इलाज चलता रहा। इस दौरान प्रत्येक 2-3 दिन के अंतराल में ब्लड-प्लेटलेट्स चढ़ाना पढ़ता था। फिर भी हिमोग्लोबिन और प्लेटलेट्स कम ही आता था। इसके बाद एक मित्र ने होम्यौपेथिक ईलाज शुरु करने का सुक्षाव दिया।
जिसके बाद इंदौर आकर डॉ. एके द्विवेदी के यहां ईलाज शुरु किया गया । महज चार दिन के ईलाज के बाद ही 21 जनवरी को सुबह जांच करवाई तो उसमें प्लेटलेट्स 18 हजार से 27 हजार हो गया था और हिमोग्लोबिन भी बढ़ा हुआ आया। इस दौरान होम्योपैथी की दवाएं ले रहा था। और जिससे प्लेटलेट्स और हिमोग्लोबिन लगातार बढ़ने लगा। उसके बाद कभी भी प्लेटलेट्स और ब्लड चढ़ाने की जरूरत नहीं हुई।

आयुष मेडिकल वेलफेयर फाउंडेशन तथा एडवांस्ड होम्योपैथिक मेडिकल रिसर्च सोसायटी इंदौर द्वारा स्वस्थ महिलाओं की हिमोग्लोबिन जांच की गई। जिसमें अतयंत चैंकाने वाला परिणाम सामने आया। जिन महिलाओं में खून की कमी उन्हे पता ही नही है। 100 महिलाओं में 48 प्रतिशत महिलाओं में रक्त की कमी पाई गई। जिनमें से 26 प्रतिशत महिलाओं के हिमोग्लोबिन 10 ग्राम से नीचे मिले। तथा 22 प्रतिशत महिलाओं के हिमोग्लोबिन 11 ग्राम के आसपास रहे। 6 प्रतिशत महिलाओं के हिमोग्लोबिन 8 ग्राम रहे। 8 प्रतिशत महिलाओं के हिमोग्लोबिन 9 ग्राम रहे। 9 महिलाओं के हिमोग्लोबिन 10 ग्राम रहे। 3 प्रतिशत महिलाओं के हिमोग्लोबिन 6 ग्राम के लगभग थी । खून की कमी के मामलो में लापरवाही से गंभीर बीमारी का खतरा बना रहता है। प्रारंभ में अतिथी स्वागत दीपक उपाध्याय व राकेश यादव द्वारा किया गया । कार्यक्रम का संचालन डाॅ अदिती द्वारा किया गया ।


