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अच्छे अनुवादक में साहित्यिक गुण होना जरूरी है: राकेश शर्मा
इंदौर. भाषाई दृष्टि से भारत में विभिन्नता हो सकती है, लेकिन सांस्कृतिक दृष्टि से भारत आज भी अखंड है. एक भाषा का सहित्यिक भाव को वैसा ही दूसरी भाषा में करना बड़ा कठिन है और इसे वही कर सकता है, जिसमें साहित्यिक गुण हो. अत: अच्छा अनुवादक वही है, जिसे साहित्य की गहरी समझ हो.
ये विचार साहित्यकार एवं वीणा के संपादक राकेश शर्मा के हैं, जो उन्होंने डॉ. शकुन्तला सिन्हा की पुस्तक चिंतन के पल-2, विश्वनाथ शिरढोणकर के काव्य संग्रह उजास की पैरवी और डॉ. सूर्यकांत नागर की मराठी में अनुदित उपन्यास लढ़ा सुरू आहे के विमोचन के अवसर पर अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहे. यह आयोजन लिवा क्लब ने अपने तीसरे स्थापना दिवस पर मध्य भार हिन्दी साहित्य समिति में किया था।
तीनों पुस्तकें सर्वोत्तम प्रकाशन ने प्रकाशित की है. यह जानकारी संयोजक अश्विन खरे ने दी. उन्होंने बताया कि डॉ. नागर की पुस्तक युद्ध जारी रहे का मराठी अनुवाद नांदेड़ की शेख तस्कीम कौसर ने किया. इस मौके पर शिरढोणकर ने दोस्ती पर कविता पढ़ी, जबकि सूर्यकांत नागर और शेख तस्कीम कौसर ने पुस्तक के बारे में विस्तार से बताया। विशेष अतिथि वरिष्ठ रंगकर्मी श्रीराम जोग ने कहा कि नाटक साहित्य की एक विधा है और इस विधा में मराठी समाज काफी सजग है।
इस अवसर पर श्रीपाद ब्रम्हे और अभिजीत पेंढारकर ने मराठी सिनेमा के 20 वर्षों का इतिहास आडियो एवं वीडियों के माध्यम से बताया. अतिथि परिचय दिलीप शोपुरकर, अमित कसगीकर ने किया। अतिथि स्वागत लिवा क्लब के अध्यक्ष रमेश खांडेकर, अरविंद जवलेकर और अश्विन खरे ने किया। कार्यक्रम का संचालन दिप्ती प्रधान ने किया और आभार माना अरविंद जवलेकर ने। कार्यक्रम में वरिष्ठ सहित्यकार चंद्रसेन विराट, संदीप राशिनकर, डॉ. पद्मासिंह, विक्रम कुमार, राधिक इंगले सहित बड़ी संख्या में गणमान्य नागरिक मौजूद थे.


