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कुम्हार की तरह शिष्य को गढ़ता है गुरु: मुक्तिप्रभ
इन्दौर. गुरु बिना जीवन सार्थक नहीं है. यदि माता-पिता रूठ जाए तो चिंता नहीं करना, बहन-संबंधी-मित्र रूठ जाए तो परेशान न होना, लेकिन गुरु रूठ जाए तो जीवन का ठौर नहीं है. गुरु के रूठने से भाग्य रूठ जाता है. आज शिष्यों में समर्पण भाव कम है. इससे गुरु भी अच्छे शिष्यों की तलाश में रहते है. शिष्यों में समर्पण और श्रद्धा का भाव होना आवश्यक है, क्योंकि गुरु कुम्हार की तरह होते है.
उक्त विचार मुनिराज मुक्तिप्रभ सागरजी ने कंचनबाग स्थित श्री नीलवर्णा पाŸवनाथ जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक ट्रस्ट में चार्तुमास धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए. मुनिराज मुक्तिप्रभ सागर ने कहा कि जैसे कुम्हार घड़ा बनाने के पहले मिट्टी को पांव से रौंदता है, लेकिन मिट्टी पांव में ही चिपक जाती है. तब वह उसे हाथों से निकालता है. फिर चाक पर एक हाथ से आकार देता है और दूसरे हाथ से पीटता है, यहीं भाव गुरु के भी होते है.
गुरु भी शिष्यों की परख करते हैं. डांटते है, फटकारते है, मारते है, लेकिन शिष्य को विश्वास होना चाहिए कि गुरु भविष्य उज्ज्वल ही बनाते है. भगवान की भक्ति आसान है, लेकिन गुरु की भक्ति कठिन, वे दुर्गुणों को समाप्त करते हैं, जैसे कुम्हार मिट्टी में से कंकड़ निकाल देता है. मनुष्य को मोक्ष की राह गुरु ही बताता है. गुरु शिष्य की अंगुली पकड़ कर परमात्मा के सामने खड़ा कर देता है.
जो मुंह पर मीठा बोले वह शत्रु
मुनि श्री ने कहा कि जो मूंह पर मीठा बोले, वही सबसे बड़ा शत्रु है और जो कड़वा बोले वही मित्र। आज हमें कोई भी शिक्षा देने वाला नहीं है. पहले मित्र गलतियों पर रोकते थे, लेकिन आज माता-पिता, बहन-बेटी, भाई सभी लोग एक साथ टीवी देखते है, इससे लोगों की आंखों की शर्म चली गई, जबकि पहले बच्चे आंख दिखाने में ही डर जाते थे. बच्चों में संस्कारों का रोपण जरूरी है.
नीलवर्णा जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक ट्रस्ट अध्यक्ष विजय मेहता एवं सचिव संजय लुनिया ने जानकारी देते हुए बताया कि आचार्य जिनमणिप्रभ सूरीश्वरजी के सान्निध्य में उनके शिष्य मुनिराज मुक्तिप्रभ सागर एवं मनीषप्रभ सागर प्रतिदिन सुबह 9.15 से 10.15 तक अपने प्रवचनों की अमृत वर्षा करेंगे.


