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गुरु-शिष्ट का संबंध हृदय का: जिनमणिप्रभ सूरीश्वरजी
इन्दौर. जैन धर्म मे गुरु का विशेष महत्व है. अरिहंत प्रभु हमारे तीर्थंकर होने के साथ साथ हमारे गुरु भी है जिन्होंने हमे जैन धर्म का ज्ञान कराया. गुरु भगवंत वो प्रसाद होते है वे जिसके भाग्य में हो उसे कभी कुछ माँगने की आवश्यकता ही नहीं रहती है. पिता पुत्र का सम्बंध तो खून का होता है लेकिन गुरु शिष्य का संबंध हृदय का होता है, तरंग का होता है. जब हृदय बोलता है तब मस्तिष्क शांत रहता है कोई बाधा नही डालता.
एरोड्रम रोड स्थित महावीर बाग में चातुर्मास हेतु विराजित जैन आचार्य जिनमणि प्रभु सूरीश्वर महाराज ने गुरु पूर्णिमा पर अपने प्रवचन में श्रावक श्राविकाओं को संबोधित करते हुए यह बात कही. उन्होए कहा कि आज आप जो मुझे सुन पा रहे है यह भी गुरु भगवंत की कृपा है. बगैर गुरु ज्ञान प्राप्ति संभव ही नही है.
उन्होंने आगे कहा कि हर व्यक्ति की मंजिल जीवन मे परमात्मा को पाने की होती है. इसके लिए वह अनेक प्रकार से जतन करता है लेकिन गुरु ही वह रास्ता होता है जो हमें परमात्मा तक पहुँचाता है. तभी तो कहा गया है गुरु गोविंद दोउ खड़े काके लागू पाय, बलिहारी गुरु आपकी गोविंद दियो बताय.
आचार्यश्री ने कहा कि गुरु दुनिया है। गुरु में हमारा जीवन समाया है। गुरु को सम्पूर्ण जीवन समर्पण के साथ अर्पित किया जाय तो निश्चित ही जीवन बदल जायेगा.


