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कुम्हार की तरह शिष्य को गढ़ता है गुरु: मुक्तिप्रभ
इन्दौर. गुरु बिना जीवन सार्थक नहीं है. यदि माता-पिता रूठ जाए तो चिंता नहीं करना, बहन-संबंधी-मित्र रूठ जाए तो परेशान न होना, लेकिन गुरु रूठ जाए तो जीवन का ठौर नहीं है. गुरु के रूठने से भाग्य रूठ जाता है. आज शिष्यों में समर्पण भाव कम है. इससे गुरु भी अच्छे शिष्यों की तलाश में रहते है. शिष्यों में समर्पण और श्रद्धा का भाव होना आवश्यक है, क्योंकि गुरु कुम्हार की तरह होते है. उक्त…
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