- इंदौर पिंक पैंथर्स मध्य प्रदेश लीग (MPL) T20-2026 में चैंपियन बनने के लक्ष्य के साथ उतरने को तैयार; टीम ने अपनी सोच और तैयारियों का रोडमैप साझा किया
- द क्रश कॉफी पर अब होगा खास संडे ब्रन्च
- जल, जीवन और जमीन के संरक्षण के लिए वृक्षारोपण आवश्यक : डॉ. ए.के. द्विवेदी
- Triptii Dimri Dives into Comedy with Maa Behen! A Full-Blown Comedy Caper Coming Up Next?
- The Rise of Ram Charan as Indian Cinema’s Complete Hero
हिप प्रिज़र्वेशन, डिस्प्लेशिया और बढ़ते आर्थराइटिस पर हुई विस्तृत चर्चा
नेशनल हिप कोर्स और इंडोकॉन 2026 का दूसरे दिन
इंदौर, 24 जनवरी, 2026: तीसरे नेशनल हिप कोर्स और इंडोकॉन 2026 के दूसरे दिन ब्रिलियंट कन्वेंशन सेंटर में वैज्ञानिक सत्र आयोजित हुए, जहाँ आज का मुख्य केंद्र हिप प्रिज़र्वेशन और हिप से जुड़े जटिल मामलों के आधुनिक उपचारों पर रहा। देश–विदेश से आए विशेषज्ञों ने हिप फ्रैक्चर, गर्दन से जुड़ी चुनौतियों, ट्रोकेन्टर एरिया की समस्याओं और आम मरीजों में बढ़ती हिप जॉइंट की संरचनात्मक गड़बड़ियों पर कई महत्वपूर्ण प्रेज़ेंटेशन दिए। दूसरे दिन की गतिविधियों ने यह भी दिखाया कि इंडोकॉन 2026, कॉन्फ्रेंस के ऑर्गेनाइजिंग चेयरमैन डॉ. हेमंत मंडोवरा और टीम के नेतृत्व में इस वर्ष हिप प्रिज़र्वेशन, आधुनिक तकनीकों और व्यावहारिक प्रशिक्षण को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है और देशभर के युवा सर्जनों को उन्नत सीख का अवसर प्रदान कर रहा है।
दिन की शुरुआत इन्फेक्शन मॉड्यूल से हुई, जिसमें शुरुआती पोस्ट-ऑपरेटिव संक्रमण, ‘द वर्ल्ड ऑफ माइक्रोब्स’ और हड्डी के संक्रमण में आने वाली जटिलताओं पर चर्चा की गई। सत्र में एफआरआई (फ्रैक्चर से जुड़ा संक्रमण) और पीजेआई (कृत्रिम जोड़ संक्रमण) में फर्क और उनके प्रबंधन के तरीकों को भी सरल भाषा में समझाया गया। इसके बाद फीमरल नेक, ट्रोकेन्टर और ओस्टियोनेक्रोसिस से जुड़े मॉड्यूल में केस स्टडी, लाइव वीडियो और पॉइंटर टॉक के माध्यम से आधुनिक तकनीकों की जानकारी दी गई।
दोपहर बाद आयोजित हिप प्रिज़र्वेशन सत्र आज का सबसे बड़ा आकर्षण रहा। इंग्लैंड से आए विशेषज्ञ डॉ. अजय मालवीया ने बताया कि कई युवा मरीज हिप जोड़ में असहजता, चलने में परेशानी और शुरुआती मूवमेंट रुकावट की शिकायत लेकर आते हैं, जिसका प्रमुख कारण अक्सर हिप डिस्प्लेशिया या बॉल–एंड–सॉकेट जॉइंट के आकार में असमानता होता है। उन्होंने समझाया कि जब जॉइंट की बॉल और सॉकेट एक-दूसरे से ठीक तरह मेल नहीं खाते, तो दोनों के बीच टकराव होने लगता है, जिससे समय के साथ जोड़ पर दबाव बढ़ता है और आर्थराइटिस जैसी समस्याएँ विकसित हो सकती हैं। उन्होंने बताया कि हिप प्रिज़र्वेशन तकनीक ऐसे मामलों में अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि यह उन मरीजों को राहत देती है जिन्हें तुरंत हिप रिप्लेसमेंट की आवश्यकता नहीं होती। कई बार दर्द, असहजता या जोड़ की शुरुआती गड़बड़ी का समय पर पता चल जाए, तो प्रिज़र्वेशन उपचार द्वारा जोड़ को लंबे समय तक सुरक्षित और कार्यशील रखा जा सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, डिस्प्लेशिया, लैबरल समस्या, कैम–पिंसर इम्पिंजमेंट आदि स्थितियों में यह तकनीक भविष्य में रिप्लेसमेंट की ज़रूरत को काफी हद तक टाल देती है, जिससे विशेष रूप से युवा और सक्रिय मरीजों को बड़ा लाभ मिलता है।
नागपुर के वरिष्ठ ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉ. सुश्रुत बाभुलकर ने कोविड के बाद बदलती बीमारी की प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा, “पोस्ट–कोविड समय में हिप आर्थराइटिस के मामलों में 25 से 30 प्रतिशत तक बढ़ोतरी देखी जा रही है। कई युवा मरीज बिना किसी चोट के भी हिप जोड़ की समस्या लेकर आते हैं। ऐसे में हिप प्रिज़र्वेशन तकनीक उन्हें भविष्य में होने वाले बड़े ऑपरेशन से बचाने में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।” उन्होंने कहा कि इस प्रकार के वैज्ञानिक सत्र युवा सर्जनों को आधुनिक तकनीक और वास्तविक केस की गहरी समझ देते हैं।
गुजरात से आए हिप और पेल्विक विशेषज्ञ डॉ. कश्यप ने बताया कि आजकल कई मरीज दवाइयों के ओवरडोज़ और अल्कोहल के अत्यधिक सेवन के कारण हिप जॉइंट में बदलाव लेकर पहुँच रहे हैं। उन्होंने कहा, “दवाइयों का अनियंत्रित उपयोग और अल्कोहल का ज़्यादा सेवन हिप जॉइंट की रक्त-आपूर्ति को प्रभावित करता है और जोड़ की प्राकृतिक संरचना पर नकारात्मक असर डालता है। ऐसे मामलों में समय पर जांच और हिप प्रिज़र्वेशन तकनीक बड़े ऑपरेशन की ज़रूरत को कम कर सकती है।”
उन्होंने यह भी कहा कि प्रारंभिक चरण में संरचनात्मक समस्याओं—जैसे बॉल और सॉकेट का मिसमैच—की पहचान भविष्य के जोखिमों को कम करने में महत्वपूर्ण होती है।
दिन के अंत में आयोजित स्किल लैब सत्र में प्रतिभागियों को एसीटैबुलर तैयारी, एंगल ब्लेड प्लेट डेमो और 3-डी आधारित हिप तकनीकों का अभ्यास कराया गया। प्रतिभागियों ने इन गतिविधियों को अत्यंत उपयोगी बताते हुए कहा कि इससे उन्हें हिप सर्जरी की बारीकियों को वास्तविक रूप में समझने का अवसर मिला।
इंडोकॉन 2026 में तीसरे दिन हिप सर्जरी के उन्नत और जटिल विषयों पर केंद्रित कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। दिन की शुरुआत पेरी-इम्प्लांट और पेरी-प्रोस्थेटिक फ्रैक्चर से जुड़े मॉड्यूल से होगी, जिसमें विभिन्न जटिल केस, रीकरेन्ट डिसलोकेशन, सीमेंटेड टीएचए की बारीकियाँ और हिप रिविजन सर्जरी के सिद्धांत समझाए जाएंगे। इसके बाद होने वाले डिबेट सत्र में वृद्ध मरीजों में पाउवेल्स टाइप-2 फ्रैक्चर के लिए फिक्सेशन या रिप्लेसमेंट का कौन-सा विकल्प अधिक उपयुक्त है इस पर विशेषज्ञ खुलकर चर्चा करेंगे। तीसरे दिन के अंतिम सत्र में सिकल सेल रोग में हिप आर्थ्रोप्लास्टी की विशेषताएँ, स्पाइन–पेल्विक संबंध, पाउवेल्स ऑस्टियोटॉमी की आधुनिक उपयोगिता और रोचक केस चर्चाएँ होंगी।
—


