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“प्रेम ह्रदय की स्वामिनी : राधा रानी”
डॉ. रीना रवि मालपानी (कवयित्री एवं लेखिका)
राधा अष्टमी प्रेम स्वरूपा परम पुनिता किशोरी जी राधा रानी का प्राकट्य दिवस है। ईश्वर की लीला में कृष्ण जन्मोत्सव के आनंद से उल्लासित होने वाले सभी भक्त अब रासेश्वरी ब्रज की महारानी के प्राकट्य दिवस में प्रेम पूर्वक भक्ति की यात्रा की ओर अग्रसर होगें। कहते है श्री कृष्ण की प्रसन्नता राधे-राधे नाम में निहित है। बरसाने वाली राधा रानी तो केवल प्रेम की कृपा बरसाने के लिए प्रकट हुई है। कृष्ण की शक्ति स्वरूपा राधा रानी है। प्रेम स्वामिनी कोमल ह्रदय से परिपूरित चन्द्रचकोरी राधा प्रेम की अनुभूति ही भक्त के जीवन में प्रदान करती है। जहाँ प्रेम होता है वहाँ ज्ञान नगण्य हो जाता है। गुण-दोष समाप्त हो जाते है।
प्रेम एक बंधन नहीं अपितु बंधन से ऊपर सर्वस्व समर्पण है। राधा-कृष्ण का मधुर संगम जीवन में प्रेम की अनुपम धारा को प्रवाहित कर देता है। कृष्ण ब्रज से जाने के पश्चात् कभी प्रेम स्वरूपा राधा को नहीं भूले, उसी प्रकार राधा भी कृष्ण के वियोग के वेदना को ही शिरोधार्य करती रही। कृष्ण के प्रेम को ही राधा अपना सर्वस्व मानती है। ब्रज की महारानी प्रेम को छल से अलग रखने की ओर प्रेरित करती है और निश्छल-निष्काम प्रेम की उत्कृष्टता को प्रदर्शित करती है। जब कृष्ण ब्रज से गए तो वे किशोरी जी को बाँसुरी भेंट कर के गए और कह कर गए की मेरी स्मृति में तुम यह बाँसुरी बजा लेना। तब श्री राधा रानी ने कहा की कन्हैया की मैं तुम्हे कभी भूलूंगी ही नहीं तो फिर बंसी कब बजाऊँगी।
राधा केवल एक नाम नहीं है बल्कि कोमल, माधुर्य एवं प्रेम ह्रदय की स्वामिनी का एक भाव है, जीवन में प्रेमपूर्वक की गई भक्ति का आनंद प्रवाहित करता है। राधा प्रेम की अभिव्यक्ति है। भावों की सरलता एवं सुंदरता से सुशोभित होती है। राधा की भक्ति में सर्वस्व श्री कृष्ण का निष्काम प्रेम है। राधा के प्रेम की शक्ति के अधीन श्री कृष्ण राधे नाम स्मरण करने से स्वयं भक्त के समक्ष होते है। जिस प्रकार कृष्ण के ह्रदय में राधे है उसी प्रकार राधे के ह्रदय में प्रेम स्वरुप श्री कृष्ण विराजमान है। हमें भी अपने जीवन में उस प्रेम के प्रतीक राधे-कृष्ण की जोड़ी को हृदय में विराजमान करना है। उद्धव श्री कृष्ण को ब्रह्म स्वरुप जानते थे और यही ज्ञान वह ब्रज वासियों को देने के लिए ब्रज गए, परन्तु ब्रज में निवासरत सभी के निष्काम प्रेम ने उद्धव के ज्ञान को भी प्रेम की भक्ति में परिवर्तित कर दिया। श्री कृष्ण के प्रति ब्रज वासियों का निश्छल प्रेम कृष्ण के प्रति अपनत्व के भावों ने उद्धव के ज्ञान को उद्वेलित कर दिया। वे समझ गए की जीवन में प्रेम का कितना महत्त्व है।
प्रेम की उत्कृष्ट भावों की माला में राधा-कृष्ण का सर्वोच्च स्थान है। वे दोनों एक ही स्वरुप है। कृष्ण प्रत्येक प्राणी को आकर्षित करते है और राधा उनमें प्रेम भाव प्रवाहित करती है, पर राधा के प्रेम में आकर्षण नहीं बल्कि सर्वस्व न्यौछावर करने की प्रेरणा निहित है। उस प्रेम में प्रेमी का कल्याण और हित होता है। वृन्दावन विहारिणी रासेश्वरी कृष्ण की सहचरी नहीं है बल्कि उनकी दिव्य शक्ति स्वरूपा है। अगाध प्रेम की स्वामिनी राधा रानी का प्राकट्य वृषभानु (सूर्य भगवान के अवतार) के यहाँ हुआ, क्योंकि भगवान विष्णु के अवतार विश्व मोहिनी का स्वरुप देखकर सूर्य भगवान के मन में उन्हें पुत्री रूप में प्राप्त करने की इच्छा हुई और ईश्वर तो भक्त के अधीन होते है और प्रभु ने भक्त की इच्छा पूर्ण करने के लिए राधा रानी के रूप में आना स्वीकार किया और भाद्रपद की शुक्ल अष्टमी को राधा रानी का प्राकट्य हुआ। श्री राधा रानी प्रेम, भक्ति और कृपा की अधिष्ठात्री देवी है। राधा के लिए श्री कृष्ण उनका सम्पूर्ण संसार है। निष्काम प्रेम की प्रतिमूर्ति राधे भक्त को ह्रदय में शांति एवं प्रेम प्रदान करती है।
राधा रानी का प्राकट्य हमें शिक्षा देता है कि कृष्ण तक पहुँचने का सबसे सुलभ मार्ग निश्छल एवं निष्काम प्रेम है, प्रभु उसी के अधीन होते है। राधा रानी के प्रेम में सर्वस्व समर्पण था कोई अपेक्षा नहीं थी। राधा अष्टमी कोई धार्मिक तिथि या त्यौहार नहीं है बल्कि यह प्रेम और करुणा से ईश्वर की साधना का सर्वोच्च समय है। राधा का प्राकट्य श्री कृष्ण की भक्ति को परिपूर्णता प्रदान करने के लिए ही हुआ है, जिससे प्रेम के बीज का अंकुरण ह्रदय में होता है।
आज के भौतिकतावादी युग में निष्काम प्रेम का भाव नगण्य हो गया है, पर प्रभु से निष्काम प्रेम किया जा सकता है क्योंकि वे ही प्रेम की सच्चाई से पूर्णतः परिचित है। राधा रानी का स्वरुप हमें प्रेम के प्रति दृढ़ता सिखाता है। ईश्वर प्राप्ति में आडम्बर नहीं वरन शुद्ध ह्रदय से प्रेम का भाव महत्वपूर्ण है। राधा का प्रेम निष्कपटता, समर्पण, त्याग एवं करुणा जैसे अलंकारों से सुशोभित होता है। उसमें स्वार्थ का कोई अस्तित्व नहीं है। भक्त जब श्री राधा रानी की शरण में जाता है तो वह प्रेम पूर्वक अपनी भक्ति की यात्रा को पूर्ण करता है। कृष्ण राधा का सम्बन्ध लौकिक एवं अलौकिक प्रेम से ऊपर निष्काम प्रेम का प्रतीक है। वह प्रेम भक्ति और करुणा का अटूट संगम है। राधा अष्टमी में व्रत एवं पूजा का विधान सिर्फ ईश्वर के प्रति भाव को प्रगाढ़ करने के लिए है। राधा रानी मूलतः जीवन में प्रेमभाव को प्रबलता प्रदान करती है और ईश्वर से मिलन का मार्ग प्रशस्त करती है। तो आइये हम श्री कृष्ण वल्लभा राधे राधे के नाम उद्घोष से कृष्ण की कृपा को प्राप्त कर आध्यात्मिक यात्रा की ओर उन्नयन करते है। जय जय श्री राधे।


